Hindi Short Story Writing

धुआ ….ना जाने किस ओर ले जाये

Short Story Writing

हर कश मे धुआ उड रहा था और हर पल मे उसे ये अहसास हो रहा था के उसने जिंदगी मे जो भी खोया वो अब पाना आसान नही है.कहते है के गुजरा वक्त वापस नही आता. तभी उसकी नजरे जो चिलम के नशे मे डूबी हुई थी.उठी और एक व्यक्ति पर टीक गई..मानो जैसे खराब घडी की सुई हो.

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पर खराब घडी भी दिन मे 2 बार सही समय बताती है.शायद ये सही समय है…वो व्यक्ति कुछ वक्त पहले उसी की तरह बैठकर चिलम से इश्क लडाता था.उसी ने तो इसकी दोस्ती इस मुई चिलम से करवाई थी.परंतु पिछले  कुछ महीनो से वो नजर नही आ रहा था.

अचानक उसके कानो मे आवाज़ आयी…”भागो  पुलिस आई है.” इस आवाज़ को कानो से दिमाग तक पहुचने मे कुछ वक्त लगा और इतनी देर मे उसके हाथो मे बेडिया बंध चुकी थी.

रास्ते मे सब लोग पुलिस जीप मे बात कर रहे थे के अपने बाप के मरने के बाद इसने ये सब छोडकर अपनी बची हुई पढाई की और आज इंस्पेकटर बन चुका  है.

ये सब सुनकर उसका दिमाग चकरा गया और उसे याद आया के वो आज सुबह अपने बाप के लिये दवाई लेने  निकला  था.

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Article on Life | अंत ही आरंभ है

मॉ की गोद मे जब मे सिसकिया लेकर रो रहा था, आंखो मे आंसू कम आवाज़ मे ज़ोर ज्यादा था । तभी अचानक एक खिलौने ने मेरी आवाज़ को एक मुस्कुराहट मे बदल दिया और अगले पल मे वो खिलौना मेरे हाथो मे आ गया । मैं बडे आराम से खिलौने से खेल रहा था । तभी किसी ने मेरे हाथ से उस खिलौने को छिन लिया । मुझे लगा था के ये अंत है पर अंत ही आरंभ है

दिल मे मैंने ठान लिया के जिस दिन घुटनो के बल चल लूंगा उस खिलौने को अपने हाथो मे फिर ले लूंगा । आखिर एक दिन मैं घुटनो के बल चलने लगा और जाकर उस खिलौने को मैंने थाम लिया । तभी वो खिलौना मेरे हाथो से फिर किसी ने छिन लिया और दौड कर वो ओझल हो गया मेरी आंखो के आगे से । मुझे लगा था के ये अंत है पर अंत ही आरंभ है ।
कुछ वक्त बाद मैं चलने और दौडने लगा । दौड कर मैंने फिर उस खिलौने को पा लिया और इस बार मैं बहुत देर तक उस खिलौने के साथ खेलते रहा । परंतु ये देर भी ज्यादा देर तक ना रुकी और फिर मेरे हाथो से खिलौने को छिन कर एक हाथ मे किताब और एक हाथ मे पेंसिल पकडा दी । मुझे लगा था के ये अंत है पर अंत ही आरंभ है । 

मैं कभी पेंसिल को तो कभी पेन को घिस-घिस कर आगे बढता गया और जब कुछ सालो मे 12 सीढीया चढकर शिखर पर पहुचा तो लगा के अबतक जो रबर सिर्फ मेरे लिखे हुये को मिटा देता था । ठीक उसी प्रकार शायद अब मैं भी अपने हिसाब से अपनी किस्मत लिख सकूंगा । पर तभी कही से कई सारी आवाजो से बस एक ही सवाल मुझे हर पल पूछा गया ।

सवाल था  “ अब आगे का क्या सोचा है “ । मेरे पास इस सवाल का एक ही ज़वाब था – “ बस अब जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहता हू “। समाज़ ने बडे बडे सलाहकारो ने अपने तरीके से मुझको समझाया परंतु मैं समझा नही तो फिर आखिर मे आंखो से ब्रहमाअस्त्र  चलाया ।  मेरे सपनो को मेरी ही आंखो से छिन कर अपने सपनो को उसमे बैठा दिया । मुझे लगा था के ये अंत है पर अंत ही आरंभ है ।
उनके सपनो को पूरा करते करते मैं अपने सपने को भी बीच बीच मे याद कर लिया करता था और जैसे मेरी मॉ ने मुझे बडा किया था ,ठीक उसी तरह मैं भी अपने सपने को धीरे-धीरे बडा करने लगा था । वक्त के साथ वो दौर भी आया जब दिमाग से ज्यादा दिल की चलने लगी और इसी दौर मे ये भी लगा के काश के वक्त अब यही ठहर जाये और उस वक्त मे ना अंत के बारे मे सोचता था ना आरंभ के बारे मे ,बस एक ठहराव सा आ गया था ।

खैर दिल से सोचने के नुकसान भी उठाये और जब मुझे लगने लगा था के इस आरंभ का अंत ना हो तभी उसने कह दिया के “आरंभ ही अंत है”  ।

इस दौर के बाद लगा के बस अब तो मैंने उनके सपनो को पूरा किया है अब मैंने अपने सपने को फिर से जीना शुरु किया ।  लेकिन समाज के सलाहकार कहा मानने वाले थे थमा दिया उन्होने मेरे हाथो मे एक अंजान सा हाथ ।
ये उन समाज के सलाहकारो की एक ही सलाह थी जो मुझे पसंद आयी थी क्योंकी जिसका हाथ मेरे हाथ मे था उसने ये कहा था –“ आरंभ का अंत तुम पर निर्भर करता है “ । मैंने अब सपने को जीना शुरु कर दिया था और बस अब किसी नये आरंभ का दूर दूर तक कोई नामो निशान नही था । परंतु जिम्मेदारियो ने हमेशा रोडे अटकाये और बार बार जब मुझे लगा के बस अब मैंने अपने सपने को पुरा कर लिया है और ये तो अंत है तब –तब उन्होने मुझे ये अहसास दिलाया के – अंत ही आरंभ है । 
Chirag Ki Kalam
जब मैं जिंदगी के आखरी पडाव पर पहुचा और ना कुछ पाने की इच्छा थी ना कुछ खोने का डर तब जाकर मुझे अहसास हुआ के अंत तो है ही नही , बस निरंतर आगे बढते रहना है । जहा सफर खत्म होगा वहा बस एक पडाव का अंत होगा । सफर का अंत तो निर्धारित ही नही है । आखिर जब पडाव खत्म हुआ बस कुछ पल के बाद फिर से मै मॉ की गोद मे जब मे सिसकिया लेकर रो रहा था । मुझे लगा था के ये अंत है पर अंत ही आरंभ है
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Love Story Book | कुछ किताबे तुम जैसी है

कुछ किताबे तुम जैसी है । पुरी होने पर भी अधुरी सी है । उनके हर पन्ने पर एक निशान बनाया है मैंने और ये निशान तुम्हारे साथ बिताये लम्हो की यादे है । किताब मे कुल मिलाकर बस 365 पन्ने है । हर पन्ने को हर दिन एक –एक करके पढता हू और जिस साल मे 366 दिन होते है, उस दिन उस साल एक खास पन्ने को दो दिन तक पढ्ता हू ।

ये वही पन्ना है जिसमे किताब के हीरो ने हीरोईन को पहली बार मेले मे देखा था । तुम्हे याद है वो मेला जब तुम वो रिंग वाले स्टाल पर उस ताजमहल की मूरत को पाने की कोशिश कर रही थी और जब-जब तुम कामयाब नही हो रही थी तो गुस्से मे सर को जोर से हिला रही थी । जिसके कारण तुम्हारी जुल्फो से एक लट बाहर आ जाती थी । ये लट तुम पर बहुत खूबसूरत लग रही थी ठीक वैसे ही जैसे किताब मे किस पन्ने तक पढा है वो याद रखने के लिये एक रेशम सा चमकदार धागा होता है । 
वो धागा जैसे किताब की खूबसूरती मे चार चांद लगा देता है । ठीक वैसे ही वो लट तुम्हारी खुबसूरती को बढा रहा थी । या तो उस दुकान वाले की उम्र ज्यादा होगी या फिर वो अपनी बीवी या गर्लफ्रेंड से डरता होगा । वर्ना मै उसकी जगह होता तो अपने हाथो से वो ताज़महल तुम्हारे हाथो मे रख देता ।

मैं चाहता तो वो ताजमहल भी जीतकर तुम्हे उस वक्त दे देता । परंतु तुम उस ताज़महल से ज्यादा खूबसूरत हो और फिर असली ताजमहल भी तुम्हारी ही तरह खूबसूरत मुमताज़ की याद मे बनाया गया था ।

तभी अचानक मेरी किताब के पन्नो को तेज़ हवा ने पलट दिया और वो उस पन्ने पर ले आयी जो उस किताब का सबसे अनमोल पन्ना था । वैसे उस पन्ने पर शीर्षक कुछ और था , परंतु मैंने तो उसे “ इज़हार” ये नाम दिया था । अब तुम समझ ही गयी हो मैं किस दिन की बात कर रहा हू । ये वही दिन है जब मैंने ये ठान लिया था के आज तुमसे दिल की बात कह के ही रहूंगा । वैसे मैंने इस दिन की तैय्यारी काफी की थी । इस दिन से ठीक एक महीने पहले अपने दोस्तो मे से किसी एक को तुम समझता और इज़हारे इश्क की प्रेक्टिस किया करता था । वैसे दोस्तो को तुम समझना काफी मुश्किल था पर और करता भी क्या ? अच्छा वैसे मेरे कालेज़ की ही एक लड्की जो मेरी अच्छी दोस्त थी ,  उसने कहा तो था के मैं प्रेक्टिस उसके साथ कर लू पर झूठ मे ही सही मैं तुम्हारे साथ बेवफाई नही कर सकता ।
आखिरकार वो दिन आ ही गया था । डर तो था मन मे के अगर तुमने मना कर दिया तो आगे की जिंदगी कैसे बिताऊंगा क्योंकि मैं भारतीय सिनेमा का वो विलेन नही था जैसा रोल शाहरुख खान ने डर मे किया था । मैं कैंटिन मे ठीक वक्त पर पहुच गया था और वही बैठा था जो तुम्हारी सबसे फेवरेट जगह थी । मेरे दोस्त तुम्हारे घर से लेकर कैंटीन तक आने की सारी खबर अपडेट दे रहे थे । उस दिन ना जाने क्यो तुम घर से देर से निकली और तुम्हारे इंतेजार मे पहले 2-4 चाय पी फिर 2 कोल्ड्रिंक । फिर लगा के कही कोल्ड्रिंक के कारण ज्यादा डकारे ना आ जाये तो फिर चाय पी ली । ये तुम्हारे इश्क का ही नशा था के ओर कुछ उस दिन असर ही नही कर रहा था ।

 

आखिरकार तुम आ गई और तुम उस पिंक सलवार-कुर्ते मे बहुत अच्छी लग रही थी । तुम जैसे ही टेबल के पास आयी मैं उठा और वहा से चल दिया । तुमने शायद इतना ध्यान नही दिया । मैं कुछ दुर जाकर काउंटर से फूल ले आया और बस वही फिल्मी अंदाज़ मे घुटनो पर बैठकर कर दिया अपने इश्क का इजहार । वैसे तुमने कुछ देर तो आश्चर्य से देखा , मेरे हाथ से फूल लिया और अपनी बुक मे उसे रखकर चल दी । तुम्हारे चेहरे पर मुस्कुराहट नही थी । मैं बडा उदास था , समझ नही आया के अब क्या करू ।
अचानक इसी सोच मे वो किताब मेरे हाथो से गिर गई और जब उसे उठाया तो किताब का वो पन्ना हाथ मे आया जब उस लडके से लडकी कुछ दिन बाद मिलकर अपना फैसला बताती है । तुम उस फूल को लेकर मेरे पास आई थी जो मैंने उस दिन तुम्हे दिया था । मुझे लगा के अगर तुमने इतने दिन तक अगर फूल सम्भाले रखा है तो जरुर कोई खास बात होगी ।  तुमने जो कहा वो अद्भुत था क्योंकी वो हर लडके ने सुना जरुर था । परंतु अपनी जिंदगी मे अपने इश्क से कभी सुनना पसंद नही करता । तुमने मेरे फूल को वापस देकर बस यही कहा के तुम मुझसे इश्क नही कर सकती । फूल जैसे ही मैंने हाथ मे लिया वो टूट्कर बिखर गया था । वैसे इस ना के कारण तो कई थे परंतु मैंने उसे जानना नही चाहता था ।

 

इसके आगे मैंने उस किताब को कभी पढा नही , दोस्त ने पढी है वो किताब कह रहा था के उस किताब के अंत मे हीरो –हीरोईन मिल गये थे । दोस्त जब –जब उस किताब के उस पन्ने का जिक्र करता था जिसमे वो लडका और लडकी कालेज़ खत्म होने पर मिलते है । तब –तब मुझे वो दिन याद आ जाता था जब कालेज़ के 3 साल बाद मैंने तुम्हे कैफे मे देखा था । दिल तो किया के तुमसे कारण पूछ लू मगर लगा के तुमने जो किया गुनाह तो नही था । इसके अलावा मैंने उस किताब के किसी ओर पन्ने के बारे मे किसी से जिक्र नही किया क्योंकि मेरे लिये तो किताब वही खत्म हो गई थी ।  

 

कुछ किताबे तुम जैसी है । पुरी होने पर भी अधुरी सी है ……..

 

ये कहानी आपको कैसी लगी बताईयेंगा , ये कहानी एक लेटर की तरह है जो एक लडके ने एक लड्की को लिखा है । .
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Half Girlfriend Movie | दोस्त से ज्यादा, पर गर्लफ्रेंड,बायफ्रेंड से कम

दोस्त से ज्यादा, पर गर्लफ्रेंड,बायफ्रेंड से कम

कहाँनीया कब और कहा बन जाये हम कह नही सकते, पर एक ऐसी जगह है जहा हर रोज़ , हर पल एक कहाँनी जन्म लेती है । ये जगह शायद इसिलिये ही बनी है और फिर जो भी यहा आता है , वो खुद कई कहाँनीयो के जाल अपने दिमाग मे बुनते रहता है । ये जगह है “कालेज़” , कालेज़ दुनिया की एकलौती ऐसी जहा कई कहाँनीया, अलग अलग किरदारो के द्वारा रची गई है । एक ऐसी ही कहाँनी आज आप सबको बताने जा रहा हू  । इस कहाँनी के सारे किरदारो के नाम बदले हुये है पर ये कहाँनी एक सच्ची है और मेरे दिल के करीब है ।

 

आयुष ने 12वी मे अपनी आई.आई.टी की जमकर की और वो आई.आई.टी मे जाने का सपना 11वी कक्षा से देख रहा था । आयुष की कोशिश और उसकी मंजिल के बीच मे वैसे तो फासले कम थे, परंतु जो हुआ वो उसने भी नही सोचा था । आयुष का सपना टूट गया और आई.आई.टी के दुसरे पडाव मे वो फेल हो गया , खैर आयुष ने अपने शहर के ही एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज़ मे दाखिला ले लिया । कालेज़ के पहले दिन से लेकर तो अगले कुछ हफ्तो तक वो हर पल आई.आई.टी मैंस के पेपर के बारे मे ही सोचता था । जब एक महीना बिता तो आयुष का दिल नये कालेज़ मे लगने लगा , नये दोस्त और नयी जगह कई बार पुरानी यादो को भुलाने मे मदद करती है ।

 

पहले साल मे आयुष का रिजल्ट भी ठीक नही रहा और साथ ही आयुष को ये अहसास भी हो गया था के उसने अपनी कैपिबिलिटी से कम मेहनत की है । आयुष को कंप्यूटर का काफी शौक था और इंटरनेट पर उसकी मुलाकात हुई एक लड्की से हुई ,बातो –बातो मे पता लगा के वो लडकी उसी के कालेज़ मे , उसी के कोर्स मे दुसरे सेक्शन मे पढती है । आयुष ने उससे वादा किया के अब जब भी कालेज़ शुरु होंगे वो उससे मिलेगा । ना जाने क्यो आयुष के हाव भाव बदलने लगे , वो आयुष जिसने अपना आत्मविश्वास खो दिया था । वो एक अलग ही रंग और रुप मे कालेज़ गया और जाते ही उसने उसे ढुढना शुरु किया । उसने अपने खास दोस्त विशाल को लिया और कहा के चल भाई – “ जरा आते है “। विशाल ने पूछा – “ कहा जाना है “। आयुष ने उसी सारी बात बताई ,विशाल – “ अच्छा तो तू शिवानी के बारे मे बात कर रहा है और उसे ढूंढ रहा है “ आयुष –“ हा भाई तू जानता है उसे “ विशाल – “ जानता तो नही बस एक बार गरिमा ने मिलवाया था “।

 

आयुष अपने दोस्त विशाल के साथ गया और जब पहली बार उसने शिवानी को देखा तो बस देखता रहा गया । सिम्पल और सोबर , एक दम वैसी लडकी जैसी आयुष सपनो मे देखा करता था । उसे कुछ देर लगा जैसे ख्वाब देख रहा हो । शिवानी ने आयुष को देखा तो नही था । पर वो उसने उसे पहले ही ढूंढ रखा था । शिवानी –“ हलो आयुष ,कैसे हो “ आयुष – “मैं बढिया हूँ तुम कैसी हो “ शिवानी – “ आई.एम फाईन”. उसके बाद शिवानी आयुष को अपने समर वेकेशन के बारे मे बताती रही और वो सुनता रहा । आखिर मे आयुष ने कहा – “ शिवानी मे तुमसे कैन्टीन मे मिलता हू “शिवानी – “ओके माय फ्रेंड” ।

 

आयुष और शिवानी कुछ ही दिनो मे अच्छे दोस्त हो गये , दोनो अपनी हर बात एक दुसरे को बताते थे । आयुष ने शिवानी से कभी कहा नही पर आयुष मन ही मन शिवानी से प्यार करने लगा था । उसके प्यार करने का कारण सिर्फ शिवानी का स्वभाव नही था । शिवानी के कारण ही आयुष को अपना खोया आत्मविश्वास पा लिया था । आयुष ने सोचा के वो शिवानी से अपने दिल की बात कह दे पर उसने सोचा अगर शिवानी रुठ गई तो ।

 

 

शिवानी ने भी आयुष से कभी कहा नही परंतु उसकी बातो से यही लगता रहा के वो भी शायद आयुष को चाहती थी । उस साल एक सबजेक्ट काफी कठिन था और पूरी क्लास मे सबको डर था के कही इस सबजेक्ट मे फेल ना हो जाये । ये डर शिवानी को भी था । शिवानी और आयुष साथ-साथ कभी पढाई नही करते थे क्योंकी आयुष अकेले पढना पसंद करता था । इसिलिये शिवानी ने इस सबजेक्ट से डर की बात आयुष को नही बताई । आयुष को जब बात पता लगी उसने शिवानी से कहा –“ तुम मुझे अपना दोस्त नही मानती “ शिवानी – “ नही आयुष ऐसी बात नही है “ आयुष- “तो तुमने मुझे नही बताया के तुम्हे इस सबजेक्ट मे दिक्क्त है , मैं तुम्हे पढा देता “ शिवानी – “आयुष तुम्हे ये सबजेक्ट आता है “ आयुष –“ हा आता है ,कल से मैं तुम्हे ये सबजेक्ट पढाऊंगा “

 

आयुष खुद उस सबजेक्ट मे कमफर्टेबल नही था परंतु उसे शिवानी को पढाना था तो बस लग गया वो पढने उसने एक रात मे 2 चैप्टर पढ डाले और फिर अगले दिन शिवानी को पढाया । धीरे-धीरे आयुष का पढाई मे इंटरेस्ट वापस आने लगा और जब उस साल का रिज्ल्ट आया तो आयुष ने क्लास मे तीसरी पोजिशन पाई । आयुष ने पूरी एक्जाम के दौरान शिवानी को पढाया और दोनो काफी वक्त साथ रहने लगे । सबको लगने लगा के ये दोनो एकदुसरे को चाहते है । अगले साल भी आयुष शिवानी को पढाता रहा और एक दिन उसने अपने दोस्त विशाल से कहा – “ आज मैं शिवानी को अपने दिल की बात बताने जा रहा हू “  विशाल –“  भाई मेरी बात माने तो रुक जा , मुझे लगता है ये थोडा जल्दी होगा “  आयुष और विशाल काफी अच्छे दोस्त थे, इसीलिये आयुष ने उसकी बात मान ली । एकदिन शाम को आयुष अपने दोस्त करण से मिलने गया । आयुष और करण स्कूल से साथ थे और करण आयुष के ही कालेज़ मे दुसरे कोर्स मे पढता था । करण को ये नही पता था के आयुष शिवानी को चाहता है ।
करण ने बातो – बातो मे कहा – “ यार वो शिवानी ,तो राज के साथ घुम रही है “ आयुष –“ कौन वो राज जो दुसरे शहर से हमारे कालेज़ मे पढने आता है “ करण –“ हा भाई वही वो मेरे कोर्स मे ही तो है “ आयुष –“ तो तू ये कहना चाहता है के वो दोनो एक दुसरे से …. “ करण – “ हा वो तो एक दुसरे को पहले साल से जानते है और तब से दोनो के बीच कुछ चल रहा था “  आयुष  के तो मानो पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गई उसे कुछ समझ नही आ रहा था । उसे दुख इस बात का नही था के शिवानी और राज़ एक दुसरे से प्यार करते है । उसे इस बात का गम था के जिसे वो अपनी अच्छी दोस्त मानता रहा उसने उससे ये बात छुपाई और सीधे –सीधे ना सही घुमा फिराकर शिवानी ने भी ये आयुष को दोस्त से बढकर माना था ।

 

आयुष कुछ दिनो तक कालेज़ नही गया । शिवानी ने भी उसे फोन किया पर उसने जवाब नही दिया , उसे लगने लगा था के शिवानी ने उसे धोखा दिया है । जब आयुष कुछ दिनो बाद कालेज़ पहुचा तो शिवानी और राज़ को साथ पाया । वो उन्हे दूर से देखकर निकल गया , उसी दिन कैंटिन मे शिवानी ने आयुष  से कहा – “ क्या बात है ,कहा थे इतने दिन “  आयुष – “ कही नही काम था “  शिवानी – “ हमे भी बताओ क्या काम था “ आयुष- “ नही बस काम था “  शिवानी-“ तो तुम हमें नही बताओगे, यही है तुम्हारी दोस्ती “ आयुष गुस्से मे था पर अपने को काबू कर के उसने शिवानी से वो बात पूछ ही ली । शिवानी कुछ देर तो हिचकिचाई और फिर कहा – “ऐसा नही है के मैं तुम्हे बताना नही चाहती थी पर सब अचानक ही हुआ “ आयुष ने शिवानी से कहा के – “तुम फिर हर दम मेरे साथ रहती थी , मुझसे ऐसे बात करती थी जैसे तुम मेरी गर्लफ्रेंड हो “

 

शिवानी ने जब ये सुना वो सब बात समझ गई और आयुष से कहा – “ तुम म्रेरे दोस्त से ज्यादा हो,पर बायफ्रेंड से कम हो “  ये कहने के बाद शिवानी वहा से चली गई । आयुष काफी देर तक ये सोचता रहा के आखिर ये कैसा रिश्ता है । उसने कभी इस रिश्ते के बारे मे नही सुना था ।

 

उसके बाद आयुष और शिवानी दोनो एक दुसरे के – दोस्त से ज्यादा, पर गर्लफ्रेंड और बायफ्रेंड से कम रहे “

 

“I am sharing a Half relationship story at BlogAdda in association with #HalfGirlfriend

 

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