मुन्नी-4

मुन्नी ने संध्या के वक़्त उस औरत से मिलने का फैसला करा . “तुम किस गाँव की हो “मुन्नी ने कहा ….शंकरपुर ….जो सागर किनारे हैं ..
फिर मुन्नी ने पुछा तुम ये धंधा कब से कर रही हो.
फिर मुन्नी को उस औरत ने बताया …मेरी शादी गाँव के एक मछुवारे से हुई थी …परन्तु वो पैसा कमाने विदेश चला गया जब कई दिनों तक नहीं आया तो में एक सेठ से शादी कर ली और अपनी लड़की को अपनी  सांस के पास छोड़ कर वहा से चली गयी.पर उस सेठ ने मुझसे बाद में धंधा करवाया और में फिर इस धंधे में आ गई .

मुन्नी ने उससे उसके पति और साँस का नाम पूछा …जब मुन्नी ने नाम सुने तो ….मानो उसके पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गई ….उसे विश्वास नहीं हो रहा था के जो औरत उसके सामने कड़ी हैं वो उसकी माँ हैं ,मुन्नी से उसे खुद क बारे में नहीं बताया और वहा से चली गई .
 अगले दिन अख़बार में खबर आई…एक बहुत बड़े गंग वार में जैक नाम के डॉन को मार डाला गया हैं ,
कुछ दिनों  बाद जब जैक के हत्यारे  को पकड़ लिया गया,जब हत्यारे को कोर्ट में लाया गया तो मुन्नी बड़ी दुविधा में पद गई क्योंकि वो हत्यारा और कोई नहीं उसका बचपन का दोस्त रमेश था ,अब मुन्नी बड़ी ही धर्मसंकट में  पद गई …लेकिन उसने कानून के अनुसार जो सजा देनी थी रमेश को वही दी …मुन्नी ने एक बार रमेश से मिलने का सोचा …रमेश ने मुन्नी को बताया के वो उसे बहुत चाहता था …परन्तु जब वो सचिन को चाहने लगी …तो उसके मन में द्वेष आ गया और उसने सचिन को मरवा दिया …उसके बाद वो इस दलदल में फसता चला गया …रमेश ने कहा मुन्नी में तुम्हारे प्यार और पिता दोनों को मार डाला …

क्या पिताजी को…परन्तु वो तो विदेश चले गए थे….तुम कब मिले उनसे …मुन्नी ने कहा .
रमेश ने  कहा के जिस जैक को उसने मारा हैं वो उसके पिताजी थे….मुन्नी की जिंदगी में जो ये तूफ़ान आया उससे मुन्नी काफी परेशान हुई ….

अगले दिन मुन्नी की माँ यानी उस औरत के केस के फैसले का दिन था …मुन्नी ने उस औरत को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और उस औरत को एक पत्र भेजा जिसमे उसने लिखा के वो उसके बेटी हैं और उसके पिताजी को उसके दोस्त ने मार डाला हैं…..

जब उसकी माँ ने वो पत्र पढ़ा तो शर्म से उसका सर झुक गया..उसने सोचा के केसी माँ हैं वो अपनी बेटी से धंधा   करवा रही थी …जीने से अच्छा हैं वो मर जाये और उसने जेल में आत्महत्या कर ली .



मुन्नों की ज़िन्दगी जिस तरह से गुजारी अब तक ..शायद उससे उसे गहरा झटका लगा….उसके सारे रिशते एक ही पल में उसके  सामने ए और चले गए .
उसने जज की कुर्सी से इस्तीफा दे दिया और अपने गाव वापस जा कर एक स्कूल खोलकर बच्चो को पढ़ने लगी .


(मेरे द्वारा लिखी गई ये कहानी पूरी तरह से काल्पनिक हैं इसके पत्रों का किसी से भी सम्बन्ध नहीं हैं )

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