सोचो ज़रा

ना गरीबी में हो रही हैं कमी ,
हो रहा है विकास देश का ,
बढ़ रही है भ्रष्टाचार की गंगा ,
और गन्दी हो रही हैं असली गंगा ।

अब अभी हो रही हैं मांग दहेज़ की ,
नाबलिको के हाथ में अब भी डाली जा रही है ,
बेडिया शादी की ।
आज भी लड़कियो का पैदा होना
माना जाता हैं अपशकुन ,
और आज भी जलाई जा रही हैं कई दुल्हन ।

time-to-think

आज भी नेता वादों से मुकर जाते हैं ,
दल को कपडो की तरह
बदलते हुए पाये जाते हैं ।

अब भी बन रही हैं गठबंधन की सरकार ,
नही है विश्वास जनता को ,
किस पर पूरा मेरे यार ।

आज भी नोट के बदले मिलते हैं वोट ,
आज भी धर्म के नाम पर होते हैं दंगे ,
आतंकवादियो की बढ़ रही हैं आबादी ,
और कर रहे हैं वो देश की बर्बादी ।

इतना सब होने पर भी सरकार सोती हैं ,
हम हर बार कहते हैं के ये सरकार है बेकार ,
परन्तु हम फ़िर भी चुनते रहे हैं ,
उन्हें ही हर बार मेरे यार ।

इस तरह से देश को देखकर ,
दिल बहुत रोता हैं मेरा ,
कैसे दूर होगी ये मुश्किलें
और कैसे बनेगा
ये सरताज दुनिया का ।

(चिराग )

2 thoughts on “सोचो ज़रा

  1. वाह ! चिराग जी,
    इस कविता का तो जवाब नहीं !
    विचारों के इतनी गहन अनुभूतियों को सटीक शब्द देना सबके बस की बात नहीं है !
    कविता के भाव बड़े ही प्रभाव पूर्ण ढंग से संप्रेषित हो रहे हैं !
    आभार!

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