मेरे महबूब

वो लटे तेरे बालो की 

कुछ कहती वो निगाहे तेरी

होठ तेरे सुर्ख लाल 

करते हैं कमाल 

 

वो चुलबुला अंदाज़ 

वो मीठी सी आवाज़

जब जब देखता हूँ तेरी हसीं 

उस दिन का सबसे खुशनसीब पल होता हैं 

वो मेरे लिए

चाहता हूँ कोई ऐसी जगह हो

जहाँ बस तू और मैं रहे 

praise-love

हाथ मैं हाथ पकड़ कर चले

समंदर के पार 

चल ले एक नया अवतार 

हवाओ का करता हूँ मैं शुक्रिया 

क्योंकि जब -जब उड़ाती हैं ये तेरी जुल्फे 

तेरी खूबसूरती में चार चाँद लग जाते हैं

हसीनाये तो कई देखी मैंने

तुझसे हसीन ना देखी कही 

तारीफ़ और क्या करू तेरी अब 

बस इतना कहूँगा के 

अगर कोई पूछे मुझसे के

इश्क कैसे होता हैं 

तो बस इतना कहूँगा के

एक बार मेरे महबूब को देख लो 

समझ आ जायेगा कैसे होता हैं .  

 

 

(चिराग )


(P.S:-This poem is for a special friend)

13 thoughts on “मेरे महबूब

  1. ye kiski sangat hai jo rang lai hai
    ye kaisi aada aaj shayari me aayi hai
    ye kiska asar alfazo me jhalak rha hai
    koi to baat hai jo tumne nhi batayi hai

    ………bol na kaun hai
    waise poem mast hai

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