फिर तेरी याद आयी

भीनी भीनी सी मिट्टी की महक आयी

ओस की बूंदों से पत्तो पर चमक आयी 

पीछे मुड़कर जब देखा मैंने 

तो याद तेरी फिर आयी 

अँधेरे  को दूर कर सूरज की रोशनी आयी 

सन्नाटे को चीरती चिडियों की चहचाहट आयी 

राज कई बंद हैं सीने में मेरे 

और उन्हें खोलने हँसी तेरी फिर आयी 

तेरी बातो का जादू हैं कुछ ऐसा

पत्थर भी सुनने लगे हैं ये कुछ ऐसा 

मधुशाला की और बढ़ते हुए मेरे कदमो को रोकने 

तेरी नशीली निगाहे  फिर आयी 

मुस्कुराते हुए वो पल फिर आये ,

तेरी जुल्फों  की छाव ले आये 

सोचा था फिर होगी मुलाकात तुझसे 

पर तुझे मुझसे छिनने  

ज़माने के ये रिवाज फिर आये .

(चिराग )

13 thoughts on “फिर तेरी याद आयी

  1. शब्द जैसे ढ़ल गये हों खुद बखुद, इस तरह कविता रची है आपने।
    ह्र्दय की गहराई से निकली अनुभूति रूपी सशक्त रचना

  2. तेरी बातो का जादू हैं कुछ ऐसा
    पत्थर भी सुनने लगे हैं ये कुछ ऐसा

    बहुत सुंदर
    एक एक शब्द पूर्ण अर्थ का बोध करता है ..और आपकी कविता की शैली बहुत सशक्त है ..यूँ ही अनवरत लिखते रहें …शुभकामनायें

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