कुछ इनसे भी सिखिये


“ खेलोगे कुदोगे बनोगे खराब,पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब “ इस लाईन को मैंने बचपन मे कई बार दुरदर्शन पर एक विज्ञापन मे हमेशा सुनता था. अगर कुछ साल पिछे जाऊ तो लगभग पूरे भारत के लोग इस बात को मानते थे. फिर धीरे-धीरे स्थिती बदलती गई और एक खेल ने तो इस लाईन को पूरा ही बदल दिया.इस खेल का नाम है “क्रिकेट”. क्रिकेट की शुरुवात तो इंग्लैड मे हुई थी.परंतु अगर इसे भारत का अनौपचारिक राष्ट्रीय खेल कहा जाये तो गलत नही होगा.
1983 मे भारत ने जब कपिल देव की कप्तानी मे विश्व कप जीता तो इस देश मे क्रिकेट की एक लहर सी दौड गई. हर किसी का सपना क्रिकेटर बनने का था और इसी सपने को कही ना कही अपने दिल मे संजोकर चार ऐसे क्रिकेटर भारत के लिये खेले जिन्होने क्रिकेट जगत मे तो अपना नाम किया ही साथ ही अपनी खूबियो से हर किसी को खेल और बाकी क्षेत्रो मे आगे बढने का एक जज्बा भी दिया.
चलिये देखते है इन क्रिकेटर की उन खूबियो को जिनसे हम बहुत कुछ सिख सकते है.
असफलता से सफलता की बीच की दूरी मे सबसे पहले हमे असफल होने के डर निकालना पडता है.डर को दूर भगाना आसान नही होता है.किस तरह इस डर को दूर भगाये ये आप क्रिकेट के भगवान सचिन तेंडुलकर से सिख सकते है. 15 नवंबर 1989 को टेस्ट क्रिकेट मे डेब्यू करने वाले सचिन को चौथे टेस्ट मे वकार यूनिस की एक गेंद नाक पर लगी थी.सचिन की नाक से काफी खून निकल रहा था..दुसरे छोर पर उस वक्त नवजोत सिह सिद्धू खडे थे.इस बात का जिक्र करते हुये वो कहते है “मुझे उम्मीद नही थी के वो उठ कर वापस खेलेगा. मै दुसरे छोर पर वापस जाने लगा तभी मैंने सुना मै खेलेगा, ये शब्द सचिन के थे.” सचिन ने डर को दूर भगाया और खडे हो गये वकार यूनिस की तेज तर्रार गेंद को खेलने के लिये. उन्होने अगली ही गेंद पर एक शानदार स्ट्रेट ड्राईव लगाकर चार रन बनाये थे. उस दिन अगर सचिन अ‍गर डर कर सफलता की ओर बढते अपने कदमो वापस ले लेते तो शायद वो आज दुनिया के महान खिलाडी नही बनते.सचिन से हमे सिखना चाहिये के सफलता की मंजिल पर हमेशा निडर होकर आगे बढना चाहिये.सचिन के लिये सिर्फ एक खेल नही जीने का एक जरिया है.ये बात सचिन की इस खेल प्रति पूर्ण निष्ठा को बताती है.
जिस तरह सिक्के के दो पहले होते है ठीक उसी तरह हर बात के भी दो पहलू होते है एक सकारात्मक और दुसरा नकारात्मक. ये हम पर निर्भर करता है के हम जिंदगी मे किस पहलू को चुन कर आगे बढते है.कई बार हम असफल होने पर चीजो के अभावो की बात करते है. हमारे पास ये किताब नही थी,हम बिमार थे ऐसे कई बहाने स्टूडेंट्स कम नबंर आने पर बनाते है.परंतु अगर हम सकारात्मक सोच के साथ आगे बढे तो हमे ऐसे बहानो की जरुरत नही पडेग़ी.अभावो को कैसे सकारात्मक सोच के साथ हम अपनी ताकत मे बदल सकते है.
इसका उदाहरण भारत के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने हमारे सामने पेश किया है. गांगुली कलकत्ता(अब कोलकाता) के जिस मैदान मे प्रेक्टिस करते थे वहा पर लेग साईड मे लोगो के घर की खिडकीया खुलती थी. इसी कारण उन्हे हर शाट आफ साईड मे मारने पडते थे.इसके कारण गांगुली आफ साईड मे तो काफी स्ट्रांग हो गये परंतु लेग साईड उनका थोडा कमजोर रहा. परंतु गांगुली ने अपनी लेग साईड की कमजोरी के बारे मे नही सोचा और अपनी आफ साईड की ताकत को लेकर आगे बढते रहे. अपने पहले ही दौरे पर इंग्लैड के खिलाफ गांगुली ने शानदार दो शतक लगाये.गांगुली को पूरा क्रिकेट जगत आफ साईड का भगवान कहता है.गांगुली अगर पहले ही ये सोच लेते के मै लेग साईड मे कमजोर हू तो शायद ही वो कभी इतना क्रिकेट खेल पाते.
सफलता पाने के लिये जो सबसे अहम कुंजी है वो है मेहनत.मेहनत करके आप किसी भी क्षेत्र मे सफल हो सकते हो. मेहनत से किस तरह आप अपने आप को महान बना सकते हो इसका उदाहरण देखने के लिये हमे भारतीय क्रिकेट टीम की “दिवार” रह चुके, “मिस्टर डिपेंडेबल” से सिखना होगा. सचिन,सौरव और द्रविड मे से सिर्फ द्रविड ही ऐसे खिलाडी है जिनके पास सचिन और सौरव जितना टेलेंट नही था.द्रविड ने अपनी मेहनत,लगन और धैर्य के जरिये अपने आप को इन दोनो महान खिलाडीयो के स्तर तक पहुचाया है. हम चाहे कितनी भी तरक्की कर ले पर आगे बढते रहने के लिये मेहनत हमेशा करनी होती है.इसका जीता जागता सबूत है राहुल द्रविड.शुरुवात मे द्रविड को सिर्फ टेस्ट बल्लेबाज़ माना जाता था. परंतु उन्होने अपने खेल पर मेहनत की और एकदिवसीय क्रिकेट मे नबंर 3 की पोजिशीन पर खेलते हुये भारत को कई मैचो मे जीत दिलाने मे अहम भुमिका निभाई. जब टीम को विकेट कीपर की जरुरत पडी द्रविड ने विकेटकीपिंग की,जब ओपनर की जरुरत पडी ओपनिंग की.अपने आप को हर रोल मे ढाल लेने की इस खूबी से हमे ये सिखना चाहीये के किस तरह हमे हर परिस्थिती के अनुसार अपने आप को ढाल लेना चाहीये.
अब तक हमने भारतीय क्रिकेट टीम के महान बल्लेबाजो के बारे मे बात की और देखा के उनकी खूबियो से हम काफी कुछ सिख सकते है.परंतु अगर अंत मे हम भारत के जुझारु और आखिर तक हार ना मानने वाले गेंदबाज़ के बारे मे बात ना करे तो शायद ये लेख अधुरा रह जायेगा.
मै बात कर रहा हू भारत की ओर से सबसे ज्यादा टेस्ट विकेट लेने वाले अनिल कुबंले की, जम्बो जी हा इस नाम से मशहूर इस लेग स्पिनर ने जब क्रिकेट खेलना शुरु किया तो सबने कहा के इसकी गेंद मे स्पिन काफी कम है और ये तेज़ गती से गेंद फेकता है.परंतु कुबंले इन सब बातो से परेशान नही हुये.बेशक उनकी गेंदो मे मुरली और वार्न जैसी स्पिन नही थी.पर उनकी गेंदबाजी की लाईन और लेंथ एकदम सटीक रहती थी.अनुशासन और एक्रागता का इससे अच्छा मेल शायद ही कही देखने को मिलेगा.अनिल कुबंले का आखरी दम तक मैदान मे जीत के लिये कोशिश करने का उनका जज्बा उन्हे कई खिलाडीयो से अलग करता था.वेस्टइंडीज मे जबडा टूट जाने के बाद मैदान मे आकर ब्रेन लारा का विकेट लेना हो या श्रीनाथ के साथ बेंगलौर(अब बेंगलुरु) मे 52 रन की मैच जिताऊ साझेदारी हो.कुबंले का आखिर तक हार ना मानने का जज्बा लाजवाब था.इस जज्बे से कुबंले हमेशा ये
सिखाते थे के अगर आप मन मे ठान लो तो हर मुश्किल डगर आसान हो जाती है.
fab four

इन चारो खिलाडीयो मे जो खूबिया है उसे आप सिर्फ अपनी स्टूडेंट लाईफ मे ही नही,बल्कि जिंदगी के हर पहलू मे अपना सकते है.चारो खिलाडी की हर खूबी हमे हर कदम पर कैसे मुश्किलो से पार पाना है ये सिखाती है.वैसे तो कई ऐसे लोग है जिनसे हम सफल होने के गुर सिख सकते है. परंतु क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो भारत मे सबसे ज्यादा देखा और खेला जाता है और ये चारो खिलाडी पिछ्ले एक दशक से भी ज्यादा वक्त से मैदान पर खेल रहे थे.जिसमे सचिन अभी भी टेस्ट क्रिकेट खेल रहे है.हमे सिर्फ इनके अच्छे प्रदर्शन पर खुश नही होना है ना ही इनके खराब प्रदर्शन पर अपना गुस्सा जाहिर करना है. हमे ये सिखना होगा के कैसे और क्यो ये इतने महान बने और हर बार अपने स्तर को बढाते ही चले गये.

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