Hindi Love Poem|आसान था अपना मेल प्रिये

      Hindi Love Poem on Marriage Anniversary

Hindi Poetry

 

आसान था अपना मेल प्रिये,
ये प्यार बड़ा अनमोल है प्रिये,

तू हरिद्वार का गंगा घाट है मैं हूं घाट की जंजीर प्रिये,
तू उज्जैन का पोहा है मैं हूं खट्टा मीठा जिरावान प्रिये,
तू ठण्ड के मौसम का जैकेट  है मैं हूं उस जैकेट का  टोपा प्रिये,
तू बाग़ में लगा गुलाब है और मैं गुलाब का काँटा प्रिये,
आसान था अपना मेल प्रिये,
ये प्यार बड़ा अनमोल है प्रिये,

Hindi Love Poem

तू क्रिकेट का बल्ला है मैं  हूँ लाल-सफ़ेद गेंद प्रिये,
तू इंद्रधनुष सा सतरंगी है मैं हूँ उसपर पड़ती धूप प्रिये,
तू चेहरे की मुस्कान है मैं हूं उस मुस्कान का कारण प्रिये,
तू बारिश बूंदे है और मैं हूं चातक प्रिये,

आसान था अपना मेल प्रिये,
ये प्यार बड़ा अनमोल है प्रिये,

तू राजमहल का सुन्दर दरवाजा है मैं हूं उस दरवाजे की कुण्डी प्रिये,
तू सबको जोड़ने वाला फेवीक्विक है मैं हूं उसका केप प्रिये,
तू चाँद सा सुन्दर है मैं उसपर लगा दाग प्रिये,
तू धड़कन मेरे दिल की है और मैं हूं उस धड़कन की धक् धक् प्रिये
आसान था अपना मेल प्रिये,
ये प्यार बड़ा  अनमोल है प्रिये | 

साथ ही इस कविता को मैंने अपनी Marriage Anniversary पर Zindagi Mix Veg के इवेंट मे भी सुनाया था । नीचे उसका विडियो देखिये ।

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Hindi Poetry on Life

Hindi Poetry on Life,This poetry tells about different thoughts and mindset of Life during my writing.

बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए,
फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,
ख्वाहिशो को आसमान दिया जाए ,
उलझनों को विराम दिया जाए
कलम भी मुरझाई सी है
सोचा उसे विचारों की स्याही दी जाए
वक्त बदलते देर नहीं लगती ,
तो सोचा क्यों ना कुछ देर विचारों को रोका जाये,
बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए,
फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,
मंजिले बहुत सी है ,
रास्ते भी है कई ,
दिल में झांक कर अपने ,
मंजिलो को फिर से समझा जाए
hindi poetry on life
इंतेजार की भी एक सीमा होती है ,
ख़त्म उसे भी किया जाए ,
नये  घर में जाने से पहले
पुराने मकान को फिर से देखा जाए
बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए,
फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,
दिल में रंजिशे भी है ,
आजाद पंछियो की तरह,
उन्हें भी दिल से विदा किया जाए ,
नयी खुशियों के लिए चलो ,
कुछ जगह की जाए
रुककर एक जगह सिर्फ बैठा ना जाए,
कमियों को अपनी ढूंढ  कर ,
दुरुस्त उन्हें किया जाए
बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए,
फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,
-चिराग जोशी

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Hindi Poetry | खामखा ही निकल जाता हूं

खामखा ही निकल जाता हूं,

खामखा ही निकल गया था,

भीड़ में अपनी पहचान बनाने ,

चंद कागज़ के टुकड़े जेबो में भरने।

लड़ाई मेरी खुद से ही थी,
दुसरो को कुछ दिखाने,
अपनो से दूर आ गया हूं
खामखा ही निकल जाता हूं,
खामखा ही निकल गया था,
Hindi Poetry
मुश्किलें मेरी अपनी थी,
सवाल भी मेरे थे,
आज कुछ दूर आकर घर से,
वही रोटी फिर खा रहा हूं
जीतने की चाहत भी थी,
हारने से घबरा रहा था,
चार कदम निकल कर शहर से,
जीत कर फिर आज हार गया हूं
खामखा ही निकल जाता हूं,
खामखा ही निकल गया था,
आभासी इस दुनिया के,
चोचलों को सच मान रहा हूं,
गाव की उस मिटटी को
आज फिर कोस रहा हूं

उड़ने की आजादी तो अब मिली है,

जंजीर से बंधे मेरे पैरो को

देखकर ही इतरा रहा हूं,
खामखा ही निकल जाता हूं,
खामखा ही निकल गया था,
वीकेंड और सैलेरी क्रेडिट
के मैसेज के इंतेजार में ही,
हफ्ते दर हफ्ते ,महीने दर महीने ,
साल गुज़ार रहा हूं।
जिस टिफिन को स्कूल में खाते वक्त बड़े सपने देखता था,
आज उसी टिफिन को महीने में कभी कभी खा रहा हूं ।
खामखा ही निकल जाता हूं,
खामखा ही निकल गया था,
मुस्कराहट जो एक वक्त पर,
बीना कारण आ जाय करती थी,
आज उसे ढूंढने के लिए,
यू ट्यूब पर aib और clc के वीडियो देखें जा रहा हूं ।
जिंदगी की एक सच्चाई है,
के पैसो से ख़ुशी नही मिलती
मैं बस उसी सच्चाई को दरकिनार करके,
रोज़ अँधेरे में निकल कर अँधेरे में वापस आ रहा हूं।
खामखा ही निकल जाता हूं,
खामखा ही निकल गया था,
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Friendship Poem In Hindi | वो था दोस्त

 

Friendship Poem In Hindi
Friendship Poem In Hindi
बचपन मे जब पार्क मे जाता था,
तो मेरे लिये जो झुला-झुलने का नबंर लगाता ,
मेरी पेंसिल की नोंक टूट जाने पर ,
अपनी पेंसिल को तोड्कर जो देता ,
वो था दोस्त,

 

टिफिन मे जो मेरी पसंद का खाना लेकर आता,
किसी से भी मेरी खातिर जो भिड जाता,
टीचर अगर मुझे क्लास से बाहर कर देता ,
तो जानबूझकर गलती करता और क्लास से बाहर हो जाता,
वो था दोस्त,

 

उसे चाहे जीरो मिले हो,
पर मेरे नबंर ज्यादा आने पर,
दुसरो को चिढाता ,
जिसके स्कूल ना आने पर,
हर चीज़ अधुरी लगती थी,
वो था दोस्त,

 

साईकल पर जो बैठा कर ,
पूरा शहर घुमाता,
संग उसके मेले मे चाट खाने का मज़ा बहुत आता,
क्रिकेट की पिच पर अगर वो साथ होता
तो हर टारगेट पूरा कर लिया जाता
वो था दोस्त,

 

अपने जन्मदिन पर सबको छोड कर,
सबसे पहले जो मुझे केक खिलाता,
मेरे गिफ्ट सबसे शानदार बताता,
और रिट्न गिफ्ट दो चार ज्यादा ही दे देता
वो था दोस्त,

 

कंधे पर जब हाथ उसका होता,
दुनिया की हर चीज़ पर हक अपना होता,
गलती होने पर जो डाटता भी
और फिर वही गलती करता
वो था दोस्त,

 

इश्क मे जब आंख भर आती,
दिल टूट जाता ,
“अरे वो तेरे लायक नही है भाई “ कहता
और फिर अगली किसी लड्की को भाभी कहता ,
और प्रेम पत्रो को उस तक पहुचाता,
वो था दोस्त,

 

पेपर के आखरी दिन तक जिसके संग पढाई करता,
जिसकी मदद से असाइन्मेट करता ,
जो कभी मेरी बातो का बुरा नही मानता ,
और जो साथ हो तो कभी डर नही लगता ,
वो था दोस्त,  
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