Bhuvneshwar Kumar Said :Sachin को out करना हमेशा याद रहेगा: भुवनेश्वर कुमार

सचिन तेंडूलकर को आऊट करने का सपना तो हर गेंदबाज़ देखता हैं पर उन्हे जीरो पर आउट करने का आइडिया हर गेंदबाज के मन मे नही आता है. कुछ ही ऐसे गेंदबाज हैं जिन्होने यह अब तक यह कारनामा किया है. उन्ही मे से एक हैं भुवनेश्वर कुमार. उत्तर प्रदेश के इस मध्यम गति के स्विंग गेंदबाज़ ने 2008 के रणजी फाईनल मे सचिन को शून्य पर आउट करा था. सचिन पहली बार घरेलू क्रिकेट मे शून्य पर आऊट हुये थे.
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एक बार ब्रैड हाग ने सचिन को आउट करने के बाद सचिन से गेंद पर आटोग्राफ मांगा था. सचिन ने गेंद पर लिखा दिया था” this will never happen again (ये अब कभी नही होगा) और आज तक वो फिर से सचिन का विकेट नही ले पाये हैं. क्या आपकी बात हुई उसके बाद सचिन से कभी इस बारे मे?
हर क्रिकेटर की तरह मैंने भी काफी लंबे समय से सचिन के साथ खेलने का सपना संजो रखा था. यह चाहे फिर उनके खिलाफ ही क्यो ना खेलना हो. उस मैच में सचिन आउट हो कर पवेलियन चले गए थे. मैं बाद में उनसे मिलने पहुचा था पर मुलाकात नहीं हो पाई. उसके बाद से कोई मौका ही नही आ पाया कि सचिन से बात हो पाती. और शायद आऊट होना तो किसी भी बल्लेबाज़ को अच्छा नही लगता हैं.
जब आप सचिन को गेंद करने जा रहे थे तो सीनियर खिलाड़ियों ने क्या कहा और आपके दिमाग मे क्या चल रहा था?
मैंने सिर्फ इतना सोचा था के मैं अपनी स्ट्रेंथ पर गेंद करुंगा. सीनियर खिलाडियों ने मेरा उस वक्त काफी हौसला बढाया था. इससे मुझे काफी मदद भी मिली थी.
प्रवीण कुमार आर.पी.सिंह आपके ही स्टेट यूपी से हैं. इनसे क्या सीखने को मिलता हैं?
काफी सिखने को मिलता हैं, किस तरह से आगे बढ़ना हैं. गेंदबाजी मे क्या सुधार करना हैं. इंटरनेशनल लेवल पर किस तरह से गेंदबाजी करनी चाहिये और वहां पहुचने के लिये तैयारी कैसे की जाए, ये सारी बातें हमें सीनियर प्लेयर्स ही बताते हैं.
भारत की पिचों पर तेज गेंदबाजो को मदद कम मिलती हैं और जहां तक स्विंग की बात करे तो वो भी यहां काफी मुश्किल है. इस स्थिति मे आप अपने आप को मोटिवेट कैसे करते हो?
हां कई बार होता हैं जब पिच से कोई मदद नही मिलती हैं. उस वक्त बस विकेट टू विकेट गेंदबाजी करना होता हैं और जैसा मैंने कहा के सीनियर प्लेयर्स काफी मदद करते हैं तो ऐसे मौकों पर उनकी टिप्स हमेशा काफी काम आती हैं.
आई.पी.एल मे आपने कई इंटरनेशल प्लेयर्स को बालिंग कराई थी. उन्हे गेंदबाजी करने में और घरेलू खिलाडीयो को गेंदबाजी करने में आप क्या अन्तर महसूस करते हैं. क्या ऐसा भी कोई समय आया कि आप को लगा कि इस बल्लेबाज को बाल कराना काफी मुश्किल है.  
इंटरनेशनल प्लेयर्स के पास अनुभव काफी ज्यादा होता हैं. साथ ही उन्हे गेंदबाजी करना एक अच्छी लर्निंग होती है. लेवल का डिफरेंस भी था वहां पर और जहां तक मुश्किल की बात हैं तो ऐसा कभी नहीं लगा. आप किसी भी बल्लेबाज को आउट कर सकते हो, बस आपको अच्छी गेंदबाजी करनी होती हैं. वहां पर सिर्फ आपकी गेंदबाजी मैटर करती हैं.
ईडन गार्डेन पर आपने अपना पहला घरेलू मैच खेला था. कैसा अनुभव रहा आपका वहां खेलने का.
ईडन गार्डेन पर खेलना कई भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों का सपना रहता हैं. मेरा भी सपना था क्यूंकि ईडन गार्डेन मेरा फैवरेट मैदान भी हैं. मैंने उस मैच मे अच्छा प्रदर्शन किया था. पहली पारी मे 3 विकेट लिये थे और इसलिये मैं इसे अपना लकी ग्राउंड मानता हूं.
जिस तरह उमेश यादव और ऐरोन के पास स्पीड है. क्या एक तेज गेंदबाज के लिये स्पीड स्विंग से ज्यादा मायने रखती हैं ?
नही ऐसा नही हैं, हर गेंदबाज का गेंदबाजी करने का स्टाईल होता हैं. उमेश और ऐरोन स्पीड से गेंदबाजी करते हैं. मेरे लिये स्विंग काफी मैटर करता है. सब कुछ इस बात पर डिपेंड करता है कि आप किस तरह से गेंदबाजी करते हैं और आपकी स्ट्रेंथ क्या है.
 
आप एक अच्छे बल्लेबाज हैं. घरेलू मैचों में आपने छ: अर्धशतक लगाये हैं. क्या आपको लगता है कि आपकी बल्लेबाजी आपके भारतीय टीम मे चयन मे मददगार रहेगी?
मै एक आलराऊंडर के तौर पर टीम मे खेलता हूं. जब आप गेंदबाजी मे अच्छा करते हो तो वो बल्लेबाजी मे फायदा मिलता हैं और जब आप बल्लेबाजी मे अच्छा करते हो तो गेंदबाजी मे आत्मविश्वास बढता हैं. अब तक के करियर मे मेरे लिये ये काफी फायदेमंद रहा हैं
आपको कब लगा कि आपको क्रिकेटर ही बनना है?
 
बचपन से शौक था क्रिकेट खेलने का, उस वक्त क्रिकेटर बनने के बारे में कभी नहीं सोचा था. फिर जब अंडर-19 मे सेलेक्शन हुआ और वहां अच्छा खेला तो लगा कि मैं क्रिकेटर बन सकता हूं.
गेंदबाजी और बल्लेबाजी मे आपका आईडियल कौन हैं?
आईडियल जैसा कुछ हैं नही पर बचपन से प्रवीण कुमार के साथ खेला हूं. हमेशा उनसे ही सिखा हैं. जब भी परेशानी आती हैं उनसे ही बात करता हूं. उनका और मेरा गेंदबाजी का अंदाज भी एक जैसा हैं.
बल्लेबाजी मे मेरा नेचुरल अंदाज हैं. कभी आईडियल नही माना किसी को, बस सचिन की बल्लेबाजी काफी पसंद आती हैं.
कितनी जल्दी अपने आप को भारतीय टीम मे देखना चाहेंगे?
 
हर कोई जो भारत मे क्रिकेट खेलता हैं वो भारतीय टीम मे खेलना चाहता हैं. जल्दी या देरी जैसी कोई बात नहीं है. बस अपना अच्छा प्रदर्शन करना हैं. बाकी चयनकर्ताओ पर निर्भर करता हैं. 
यहा तक पहुचने का श्रेय किसे देंगे?
यहां तक पहुचने का श्रेय मैं अपने माता पिता और दीदी को देना चाहता हूं. जब पहली बार स्टेडियम मे गया था तब मै काफी छोटा था. तब मेरी दीदी मुझे खेलने ले गई थी. ये ऐसा लम्हा हैं जो हमेशा मुझे याद रहेगा. साथ ही मेरे कोच विपिन और संजय रस्तोगी को भी मे इसका श्रेय देना चाहूंगा उन्होने जो भी मुझे सिखाया हैं. उसी की बदौलत यहाँ तक पहुचा हूं.
नये खिलाड़ियों के लिये आपके सुझाव.
क्रिकेट एक ऐसा खेल हैं जिसमे काफी उतार चढाव आते हैं. तो इतना कहना चाहूंगा कि आप अपना फोकस हमेशा खेल पर ही रखें और अपनी ओर से मेहनत करना बन्द न करें.
आप अपना खाली वक्त किस तरह बिताते हैं?
गाने सुनता हूऔर दोस्तों के साथ घूमता हूं.
आपका पसंदीदा सिंगर कौन हैं.
सोनू निगम के गाने मुझे काफी अच्छे लगते हैं. उनके एलबम का गाना चंदा की डोली”मुझे काफी पसंद हैं.
अब तक का यादगार पल
सचिन को आऊट करना अब तक का सबसे यादगार पल रहा हैं. उस मैच मे 5 विकेट भी लिये थे साथ मे 80 रन भी बनाये थे तो वो मैच मुझे अब तक याद हैं.

 

ये इंटरविव मैंने 2011 मे दखलंदाजी की ओर से लिया था ।

 

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Legends of Indian Cricket:Sachin Dravid Ganguly Kumble | कुछ इनसे भी सिखिये

 
“ खेलोगे कुदोगे बनोगे खराब,पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब “ इस लाईन को मैंने बचपन मे कई बार दुरदर्शन पर एक विज्ञापन मे हमेशा सुनता था. अगर कुछ साल पिछे जाऊ तो लगभग पूरे भारत के लोग इस बात को मानते थे. फिर धीरे-धीरे स्थिती बदलती गई और एक खेल ने तो इस लाईन को पूरा ही बदल दिया.इस खेल का नाम है “क्रिकेट”. क्रिकेट की शुरुवात तो इंग्लैड मे हुई थी.परंतु अगर इसे भारत का अनौपचारिक राष्ट्रीय खेल कहा जाये तो गलत नही होगा.
1983 मे भारत ने जब कपिल देव की कप्तानी मे विश्व कप जीता तो इस देश मे क्रिकेट की एक लहर सी दौड गई. हर किसी का सपना क्रिकेटर बनने का था और इसी सपने को कही ना कही अपने दिल मे संजोकर चार ऐसे क्रिकेटर भारत के लिये खेले जिन्होने क्रिकेट जगत मे तो अपना नाम किया ही साथ ही अपनी खूबियो से हर किसी को खेल और बाकी क्षेत्रो मे आगे बढने का एक जज्बा भी दिया.
चलिये देखते है इन क्रिकेटर की उन खूबियो को जिनसे हम बहुत कुछ सिख सकते है.
असफलता से सफलता की बीच की दूरी मे सबसे पहले हमे असफल होने के डर निकालना पडता है.डर को दूर भगाना आसान नही होता है.किस तरह इस डर को दूर भगाये ये आप क्रिकेट के भगवान सचिन तेंडुलकर से सिख सकते है. 15 नवंबर 1989 को टेस्ट क्रिकेट मे डेब्यू करने वाले सचिन को चौथे टेस्ट मे वकार यूनिस की एक गेंद नाक पर लगी थी.सचिन की नाक से काफी खून निकल रहा था..दुसरे छोर पर उस वक्त नवजोत सिह सिद्धू खडे थे.इस बात का जिक्र करते हुये वो कहते है “मुझे उम्मीद नही थी के वो उठ कर वापस खेलेगा. मै दुसरे छोर पर वापस जाने लगा तभी मैंने सुना मै खेलेगा, ये शब्द सचिन के थे.” सचिन ने डर को दूर भगाया और खडे हो गये वकार यूनिस की तेज तर्रार गेंद को खेलने के लिये. उन्होने अगली ही गेंद पर एक शानदार स्ट्रेट ड्राईव लगाकर चार रन बनाये थे. उस दिन अगर सचिन अ‍गर डर कर सफलता की ओर बढते अपने कदमो वापस ले लेते तो शायद वो आज दुनिया के महान खिलाडी नही बनते.सचिन से हमे सिखना चाहिये के सफलता की मंजिल पर हमेशा निडर होकर आगे बढना चाहिये.सचिन के लिये सिर्फ एक खेल नही जीने का एक जरिया है.ये बात सचिन की इस खेल प्रति पूर्ण निष्ठा को बताती है.
जिस तरह सिक्के के दो पहले होते है ठीक उसी तरह हर बात के भी दो पहलू होते है एक सकारात्मक और दुसरा नकारात्मक. ये हम पर निर्भर करता है के हम जिंदगी मे किस पहलू को चुन कर आगे बढते है.कई बार हम असफल होने पर चीजो के अभावो की बात करते है. हमारे पास ये किताब नही थी,हम बिमार थे ऐसे कई बहाने स्टूडेंट्स कम नबंर आने पर बनाते है.परंतु अगर हम सकारात्मक सोच के साथ आगे बढे तो हमे ऐसे बहानो की जरुरत नही पडेग़ी.अभावो को कैसे सकारात्मक सोच के साथ हम अपनी ताकत मे बदल सकते है.
इसका उदाहरण भारत के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने हमारे सामने पेश किया है. गांगुली कलकत्ता(अब कोलकाता) के जिस मैदान मे प्रेक्टिस करते थे वहा पर लेग साईड मे लोगो के घर की खिडकीया खुलती थी. इसी कारण उन्हे हर शाट आफ साईड मे मारने पडते थे.इसके कारण गांगुली आफ साईड मे तो काफी स्ट्रांग हो गये परंतु लेग साईड उनका थोडा कमजोर रहा. परंतु गांगुली ने अपनी लेग साईड की कमजोरी के बारे मे नही सोचा और अपनी आफ साईड की ताकत को लेकर आगे बढते रहे. अपने पहले ही दौरे पर इंग्लैड के खिलाफ गांगुली ने शानदार दो शतक लगाये.गांगुली को पूरा क्रिकेट जगत आफ साईड का भगवान कहता है.गांगुली अगर पहले ही ये सोच लेते के मै लेग साईड मे कमजोर हू तो शायद ही वो कभी इतना क्रिकेट खेल पाते.
सफलता पाने के लिये जो सबसे अहम कुंजी है वो है मेहनत.मेहनत करके आप किसी भी क्षेत्र मे सफल हो सकते हो. मेहनत से किस तरह आप अपने आप को महान बना सकते हो इसका उदाहरण देखने के लिये हमे भारतीय क्रिकेट टीम की “दिवार” रह चुके, “मिस्टर डिपेंडेबल” से सिखना होगा. सचिन,सौरव और द्रविड मे से सिर्फ द्रविड ही ऐसे खिलाडी है जिनके पास सचिन और सौरव जितना टेलेंट नही था.द्रविड ने अपनी मेहनत,लगन और धैर्य के जरिये अपने आप को इन दोनो महान खिलाडीयो के स्तर तक पहुचाया है. हम चाहे कितनी भी तरक्की कर ले पर आगे बढते रहने के लिये मेहनत हमेशा करनी होती है.इसका जीता जागता सबूत है राहुल द्रविड.शुरुवात मे द्रविड को सिर्फ टेस्ट बल्लेबाज़ माना जाता था. परंतु उन्होने अपने खेल पर मेहनत की और एकदिवसीय क्रिकेट मे नबंर 3 की पोजिशीन पर खेलते हुये भारत को कई मैचो मे जीत दिलाने मे अहम भुमिका निभाई. जब टीम को विकेट कीपर की जरुरत पडी द्रविड ने विकेटकीपिंग की,जब ओपनर की जरुरत पडी ओपनिंग की.अपने आप को हर रोल मे ढाल लेने की इस खूबी से हमे ये सिखना चाहीये के किस तरह हमे हर परिस्थिती के अनुसार अपने आप को ढाल लेना चाहीये.
अब तक हमने भारतीय क्रिकेट टीम के महान बल्लेबाजो के बारे मे बात की और देखा के उनकी खूबियो से हम काफी कुछ सिख सकते है.परंतु अगर अंत मे हम भारत के जुझारु और आखिर तक हार ना मानने वाले गेंदबाज़ के बारे मे बात ना करे तो शायद ये लेख अधुरा रह जायेगा.
मै बात कर रहा हू भारत की ओर से सबसे ज्यादा टेस्ट विकेट लेने वाले अनिल कुबंले की, जम्बो जी हा इस नाम से मशहूर इस लेग स्पिनर ने जब क्रिकेट खेलना शुरु किया तो सबने कहा के इसकी गेंद मे स्पिन काफी कम है और ये तेज़ गती से गेंद फेकता है.परंतु कुबंले इन सब बातो से परेशान नही हुये.बेशक उनकी गेंदो मे मुरली और वार्न जैसी स्पिन नही थी.पर उनकी गेंदबाजी की लाईन और लेंथ एकदम सटीक रहती थी.अनुशासन और एक्रागता का इससे अच्छा मेल शायद ही कही देखने को मिलेगा.अनिल कुबंले का आखरी दम तक मैदान मे जीत के लिये कोशिश करने का उनका जज्बा उन्हे कई खिलाडीयो से अलग करता था.वेस्टइंडीज मे जबडा टूट जाने के बाद मैदान मे आकर ब्रेन लारा का विकेट लेना हो या श्रीनाथ के साथ बेंगलौर(अब बेंगलुरु) मे 52 रन की मैच जिताऊ साझेदारी हो.कुबंले का आखिर तक हार ना मानने का जज्बा लाजवाब था.इस जज्बे से कुबंले हमेशा ये
सिखाते थे के अगर आप मन मे ठान लो तो हर मुश्किल डगर आसान हो जाती है.
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इन चारो खिलाडीयो मे जो खूबिया है उसे आप सिर्फ अपनी स्टूडेंट लाईफ मे ही नही,बल्कि जिंदगी के हर पहलू मे अपना सकते है.चारो खिलाडी की हर खूबी हमे हर कदम पर कैसे मुश्किलो से पार पाना है ये सिखाती है.वैसे तो कई ऐसे लोग है जिनसे हम सफल होने के गुर सिख सकते है. परंतु क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो भारत मे सबसे ज्यादा देखा और खेला जाता है और ये चारो खिलाडी पिछ्ले एक दशक से भी ज्यादा वक्त से मैदान पर खेल रहे थे.जिसमे सचिन अभी भी टेस्ट क्रिकेट खेल रहे है.हमे सिर्फ इनके अच्छे प्रदर्शन पर खुश नही होना है ना ही इनके खराब प्रदर्शन पर अपना गुस्सा जाहिर करना है. हमे ये सिखना होगा के कैसे और क्यो ये इतने महान बने और हर बार अपने स्तर को बढाते ही चले गये.

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Ajinkya Rahane,The Last Warrior | द्रविड के स्कूल का आखरी स्टूडेंट

 
 रहाणे कभी उस तरह के बल्लेबाज़ नही रहे जो आते ही ताबड्तोड रन बनाने लगे। लेकिन वो हमेशा से ईनिंग को बिल्ड करते है और टीम को एक ऐसी पोजिशन मे पहुचाते है जहा से टीम के बडे हिटर स्कोर को आगे बढा सके, साथ ही अभी की जो भारत की टीम है उसमे अधिकतर स्ट्रोक प्लेयर है। रहाणे ऐसी टीम मे एक धागे की तरह है जिनके इर्द-गिर्द बाकी लोग खेल सकते है।

 

 

भारतीय क्रिकेट मे कई खिलाडी आये और गये। परंतु कुछ ही खिलाडी महान बन पाये और उनमे से एक-दो ही अपने आप मे एक स्कूल बन पाये। जी हा “स्कूल” , वो खिलाडी जिसने रिटायर्मेंट के बाद भी अपना योगदान भारत के क्रिकेट को देना जारी रखा। राहुल द्रविड एक ऐसे ही खिलाडी है। रिटायर्मेंट के बाद द्रविड अभी भारत की ए टीम के कोच है। द्रविड का योगदान एक कोच की भूमिका मे ऐसे ही रहा है जैसा महाभारत मे गुरु द्रोणाचार्य का रहा था। द्रोणाचार्य तो केवल एक ही एकलव्य से मिले थे। परंतु द्रविड के कई सारे शिष्य एकलव्य की तरह उन्हे अपना गुरु मान कर मेहनत कर रहे है। उनके सारे एकलव्य ठीक उनकी तरह तो नही है परंतु एक एकलव्य उनके काफी आसपास आ गया है। उस एकलव्य का नाम है “अजिंक्य रहाणे”। 
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रहाणे एक मध्यमवर्गीय महाराष्ट्रीयन परिवार मे जन्मे थे। डोम्बिवली से दक्षिण मुबंई तक रोज़ लोकल ट्रेन मे सफर करके मैदान तक पहुचते थे। शुरु से ही थोडे दुबले-पतले रहाणे साथी खिलाडियो से थोडे छोटे लगते थे। परंतु टैलेंट मे वो सबसे आगे थे। ऐसे ही एक बार दक्षिण मुबंई मे एक मैच के दौरान लगभग दस साल के रहाणे अपना पुराना सा बैट लेकर बैटिंग करने उतरे, उनके सामने एक बीस साल का नौजवान (जो बहुत तेज़ गती से गेंद फेकता था।‌) खडा था। उसने पहली गेंद फेकी और सीधा रहाणे के हेलमेट पर जाकर लगी और वो धडाम से नीचे गिर गये। सब लोग मदद के लिये दौडे, कोई पानी पिला रहा था, कोई जाने के लिये कहरहा था और रहाणे दर्द से रो रहे थे। तभी अपांयर ने आकर रहाणे से कहा –“खेलना हो तो उठो, वर्ना घर जाओ”। रहाणे उठे, अपना हेलमेट सही किया, अपने आंसू पोछे और तैय्यार हो गये खेलने के लिये। उसके बाद जो हुआ वो रहाणे आज तक करते आ रहे है। रहाणे ने उस गेंदबाज़ को 4 गेंद पर चार चौके लगाये। ऐसे ही उन्हे 2013 मे डरबन मे डेन स्टेन का एक बाऊंसर हेलमेट पर लगा था। तब भी वो घबराये नही और खेलते रहे। उन्होने उस टेस्ट मैच मे पहली पारी मे नाट-आऊट 51 और दुसरी पारी मे 96 रन बनाये थे। 

 

रहाणे ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट करियर और इंग्लैड के खिलाफ वन-डे एवं टी-20 करियर का आगाज़ किया था। अपने पहले टेस्ट (मार्च 2013) मे उन्होने पहली पारी मे 7(19) और दुसरी पारी मे 1(5) रन बनाये थे। रहाणे ने अपने वन-डे करियर की शुरुवात पहले (सितबंर 2011) की थी उस पारी मे उन्होने 40(44) बनाये थे और अपने पहले टी-20(अगस्त 2011) मे 61(39) रन बनाये थे। इन दोनो पारियो मे जो खास बात थी वो यह के इन दोनो पारियो मे उन्हे अपने गुरु राहुल द्रविड के साथ खेलने का मौका मिला था। अपने पहले टी-20 मे तो रहाणे ने द्रविड के साथ मिलकर दुसरे विकेट के लिये 65 रनो की साझेदारी की थी। अब तक खेले 45 टेस्ट मैच मे उन्होने 43.17 की औसत से 2893 रन बनाये है। जिसमे 9 शतक और 12 अर्धशतक शामिल है। इन 9 शतको और 12 अर्धशतको मे से 6 शतक और 9 अर्धशतक विदेशी धरती पर आये है। उनका 43.17 का औसत भी विदेशी धरती पर 52.05 तक पहुच जाता है। ये साफ दर्शाता है के उनके पास वो तकनीक है जिससे वो भारत के बाहर सफल हो रहे है और आगे भी होंगे।

 

रहाणे कभी उस तरह के बल्लेबाज़ नही रहे जो आते ही ताबड्तोड रन बनाने लगे। लेकिन वो हमेशा से ईनिंग को बिल्ड करते है और टीम को एक ऐसी पोजिशन मे पहुचाते है जहा से टीम के बडे हिटर स्कोर को आगे बढा सके, साथ ही अभी की जो भारत की टीम है उसमे अधिकतर स्ट्रोक प्लेयर है। रहाणे ऐसी टीम मे एक धागे की तरह है जिनके इर्द-गिर्द बाकी लोग खेल सकते है। परंतु इतने काम के बल्लेबाज़ होने के बाद भी इंग्लैड के दौर पर गयी भारत की वन –डे टीम मे उन्हे जगह नही दी। कारण ये के वो बाकी बल्लेबाजो की तरह 100 गेंद खेलकर 120-130 नही बनाते और लम्बे-लम्बे छ्क्के नही लगाते। परंतु इंग्लैड मे जहा गेंद स्विंग होती है और अगला वर्ल्ड कप भी है वहा रहाणे मुश्किल परिस्थितियो मे भी अपने कलात्मक अंदाज़ से रन बना देंगे जैसा वो अब तक करते आये है। 

 

वैसे तो भारतीय टीम मे कई धुरंधर खिलाडी है। रोहित,धवन और विराट इस टीम की जान है। ये तीनो मे से अगर कोई एक भी चल निकलता है तो बाद के बल्लेबाज़ आसनी या तो टीम के स्कोर को बढा देते है या फिर रनो का पिछा करते हुये मैच जीता देते है। लेकिन हर बार ऐसा नही होता है और अगर बात इंग्लैड की पिचो की हो तो वहा गेंद स्विंग काफी होती है। इस तरह की पिचो पर शुरुवात के विकेट अक्सर जल्दी गिर जाते है और अगर आपके शुरु के तीन बल्लेबाज़ आक्रमक तरीके से खेलते है तो उनके आऊट होने के चांस और ज्यादा हो जाते है। दिसबंर 2017 मे श्रीलंका के खिलाफ एक वन-डे मे हिमाचल मे हुये मैच मे भारत की आधी टीम 30 रन से कम पर आऊट हो गई थी। उस मैच मे बस विराट नही थे और हा रहाणे भी नही थे। ऐसी पिच पर एक ऐसे बल्लेबाज़ की जरुरत थी जो पिच पर रुककर खेलना जानते हो और रहाणे इसमे माहिर है। इंग्लैड के इस दौरे पर वन-डे टीम मे अबांति रायडू को जगह दी और जैसे उनका वन-डे और स्विंग के खिलाफ रिकार्ड है उससे साफ दिखता है के उन्हे सिर्फ और सिर्फ आई.पी.एल  के प्रदर्शन के आधार पर टीम मे चुना गया है। खैर वो यो-यो टेस्ट पास नही कर पाये और टीम से बाहर कर दिये गये। लेकिन फिर भी रहाणे को  उनकी जगह टीम मे ना लेकर सुरेश रैना को ले लिया गया जिनके बारे मे सबको पता  है के वो जब गेंद स्विंग हो और बाउंसी विकेट हो तो ज्यादा रन नही बना पाते। ये इंग्लैड ही है जहा पर प्रदर्शन खराब होने के कारण पहले टीम से बाहर हो गये थे। डर सिर्फ इस बात का है अगर इस बार फिर ऐसा  हुआ  किसी मैच मे तो भारत के पास बेंच पर रहाणे नही होंगे जो टीम को अगले मैच मे बचा ले। भारत की टीम इस बार पहले टी-20 और वन-डे पहले खेल रही है ताकी टेस्ट से पहले टीम अपने आप को इंग्लैड की परिस्थितियो से अभस्त करले। परंतु इसके साथ ही आत्मविश्वास भी जरुरी है। अगर टी-20 और वन-डे मे अगर कही कुछ गडबड हुई तो टीम अपना आत्मविश्वास खो देंगी। सबसे जरुरी बात ये है के अगला वर्ल्ड कप इंग्लैड मे ही है। द्रविड के बाद रहाणे है जिन्होने क्रिकेट के मक्का “लार्ड्स” मे शतक जमाया है। भारत की टेस्ट टीम का उपकप्तान को वन-डे टीम मे जगह नही मिली ये बात आश्चर्य से कम नही है। 

 

रहाणे ने अब तक 90 मैच  मे 35.26 की औसत से 2962 रन बनाये है। जिसमे 3 शतक और 24 अर्धशतक शामिल है। रहाणे को वन-डे टीम मे शामिल ना करके शायद चयनकर्ताओ ने एक ऐसी गलती कर दी है जिसकी भरपाई करना आसान नही होगा। हम सब चाहते है के भारत की टीम इंग्लैड मे हर फार्मेट मे जीत हासिल करे और अगर ऐसा हुआ तो रहाणे की जगह चुने गये खिलाडी उस पोजिशन पर अपनी जगह स्थापित कर लेंगे और फिर रहाणे कभी रंगीन कपडो मे ना दिखेंगे।

 

देखा जाये तो रहाणे द्रविड के स्कूल के आखरी स्टूडेंट है जिनमे द्रविड की शैली की झलक देखने को मिलती है। ऐसा नही है के और खिलाडी नही आयेंगे द्रविड के स्कूल से परंतु अब जब दौर टी-20 का और 50 ओवर मे 300 रन भी मामूली लगने का हो द्रविड वाली शैली मे खेलने वाले शायद ही मिलेंगे।

 

आखिर मे हम आपको छोडे जा रहे है एक विडीयो के साथ जिसमे आप रहाणे की एक बेहतरीन वन-डे पारी को देख सकेंगे 

 

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बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए, फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,

बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए,
फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,
ख्वाहिशो को आसमान दिया जाए ,
उलझनों को विराम दिया जाए
कलम भी मुरझाई सी है
सोचा उसे विचारों की स्याही दी जाए
वक्त बदलते देर नहीं लगती ,
तो सोचा क्यों ना कुछ देर विचारों को रोका जाये,
बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए,
फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,
मंजिले बहुत सी है ,
रास्ते भी है कई ,
दिल में झांक कर अपने ,
मंजिलो को फिर से समझा जाए
Chirag ki kalam
इंतेजार की भी एक सीमा होती है ,
ख़त्म उसे भी किया जाए ,
नये  घर में जाने से पहले
पुराने मकान को फिर से देखा जाए
बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए,
फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,
दिल में रंजिशे भी है ,
आजाद पंछियो की तरह,
उन्हें भी दिल से विदा किया जाए ,
नयी खुशियों के लिए चलो ,
कुछ जगह की जाए
रुककर एक जगह सिर्फ बैठा ना जाए,
कमियों को अपनी ढूंढ  कर ,
दुरुस्त उन्हें किया जाए
बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए,
फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,
-चिराग जोशी