WOW-Mind Your Language-क्योंकी हिंदी मॉ ने सिखायी है

भाषा इस दुनिया के निर्माण  का एक अहम हिस्सा है । जैसे हवा और पानी जीने के लिये जरुरी है । ठीक उसी तरह भाषा के बगैर इस दुनिया की कल्पना भी नही की जा सकती है । इस दुनिया मे कई तरह की भाषाये है और हर उस भाषा का उपयोग का जो लोग करते है ,उनके लिये वो भाषा उनकी मॉ,पिता और गुरु से कम दर्जा नही रखती है ।

जैसा अब तक के मेरे लेखन से लग गया होगा । मैं जिस भाषा की बात कर रहा हू । वो है “ हिंदी “। हिंदी मेरे लिये भाषा ही नही मेरी मॉ जैसी है । इसके अनेक कारण है और उन्ही कारणो का जिक्र आज मैं करुंगा ।

हिंदी मुझे मेरी मॉ ने सिखायी है । जब छोटा था तो मैंने “ मॉ “  कहना सिखा जो हिंदी का शब्द है । हिंदी मैं मैंने अपने जीवन की पहली डाट भी खायी और चाहे पेपर अंग्रेजी हो या गणित का हर पेपर के पहले मैंने भगवान का नाम भी हिंदी मे लिया था । हिंदी मे जब-जब मैंने कुछ किसी से सुना या किसी को सुनाया मुझे समझ भी आया और मेरी बात को समझा भी गया । हिंदी मे ही मैंने अपना पहला गाना सुना और हिंदी के गाने को ही मैंने अपने क्रश को देखकर गुनगुनाया । “ रिश्ते मैं तो हम तुम्हारे बाप लगते है “ , ये लाईन जब दोस्तो के सामने कही तो वो भी हिंदी मे ही थी ।

मेरे जीवन मे हिंदी का मह्त्व काफी रहा है , खुशी और गम दोनो मे ही हिंदी ही थी जिसने मेरा हमेशा साथ दिया है । हिंदी के अलावा मैं अपनी बात अंग्रेजी मे ही कहता हू और अंग्रेजी का अखबार पढता भी हू । परंतु चाय की चुस्की के साथ जब हिंदी के अखबार को पढ्ता हू तो लगता है जन्न्त ओर कही नही यही है । हमारी फिल्मे और हमारे देश का संगीत कई भाषाओ मे है । परंतु सबसे ज्यादा देखी जाने वाली फिल्मे और सबसे ज्यादा सुना जाने वाला संगीत हिंदी भाषा मे ही है ।

जब मैंने लिखना शुरु किया तो हिंदी मे किया फिर बीच-बीच मे अंग्रेजी मे लिखा परंतु जब-जब मुझे कोई बात दिल से कहने का मन हुआ । वो बात हमेशा हिंदी मे ही लिखी , फिर चाहे वो पहली कविता हो या पहली शायरी या फिर उसके लिये लिखी वो चार लाईने क्यो ना हो जब-जब मदद की जरुरत पडी । मैने हिंदी को अपने पिछे खडा पाया । मुझे आज भी याद है के हिंदी के विषय मे मुझे कभी ज्यादा मेहनत नही करनी पडी क्योंकी हिंदी मे लिखा हुआ याद करना नही पडता था । बस पढते जाओ और लाईन दर लाईन हर शब्द दिमाग मे उतरता जाता है । हिंदी की सबसे अच्छी बात मुझे ये लगी के हिंदी ने हर भाषा को जगह दी हो फिर वो चाहे उर्दू हो या अंग्रेजी ।
हिंदी मुझे बहुत प्यारी है और सच कहू तो मैं हिंदी मे बोलने और लिखने मे गर्व महसूस करता हू ।  

This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda.

हम भारतीय जुगाडू है

भारत एक ऐसा देश है, जहा कई प्रकार के रिती-रिवाज़, नियम-कानून है और तरह तरह के लोग रहते है । हर शहर, हर गाव मे यहा एक ही काम करने के तरीके अलग- अलग है । अगर साफ और सीधे शब्दो मे कहे तो हम भारतीय जुगाडू है । हमारे पास हर काम को करने के एक से एक नायाब तरीके है । चलिये तो फिर आज उन्ही तरीको मे से कुछ पर नज़र डालते है ।

the Indian way-Indiblogger

  1. पायजामे मे नाडा डालना – हमारे भारत मे पायजामा और उसके नाडे का एक गहरा सबंध है ।नाडे के बिना पायजामे की और पायजामे के बिना नाडे की कल्पना ही नही की जा सकती है । जब भी पायजामे का नाडा निकल जाता है । उसे डालने के लिये शायद किसी ओर देश मे बडी दिक्क्त आये परंतु हमारे भारत मे ये काम आसान है । उसके लिये चाहिये बस एक टूथब्रश, उसके एक सिरे पर नाडे को बांध के पायजामे मे डाल देते है और पायजामे मे बडे ही आसानी से नाडा डाल दिया जाता है । इसमे आप दो तरह के जुगाड देख सकते है एक तो नाडे को पायजामे मे डालना, दूसरा टूथब्रश जब पुराना हो जाये तो उसका उपयोग भी हो जाता है । टूथब्रश का उपयोग यहा खत्म नही होता इसके अलावा कई लोग इससे अपने वाशबेसिन को तो कुछ अपने तोते के पिंजरे को भी साफ करते है ।

  1. लाईन मे लगे बिना टिकीट लेना – दुनिया शायद एक दिन खत्म हो लेकिन हमारे यहा बस और ट्रेन की टिकीट की लाईन कभी खत्म नही होगी । हम कई बार ट्रेन या बस मे सफर कर चुके है फिर भी कई बार जाने मे और कभी अनजाने मे हम लेट हो जाते है । फिर हम जब देखते है टिकीट खिडकी पर लम्बी लाईन देखते है , तो हमारे अंदर बीरबल से भी तेज़ दौडता है और हम उस इंसान को ढूंढते है जिसे हम अपना काम्चलाऊ ताऊ,चाचा,अंकल या भाई बना सके । उसके पास जाके हम धीरे से अपनी दुविधा बता देते है और उस तरह से आग्रह करते है जैसा हमने आज तक हमने किसी से नही किया ।

  1. बस मे सीट ढूंढ्ना – अब ट्रेन मे टिकीट मिलने के बाद भी कहा हमारा जुगाड खत्म होता है । इसके बाद चाहे ट्रेन मे खडे होने की जगह ना हो फिर भी हम आसपास के तीन डब्बे मे ऐसे चक्कर लगाते है जैसे अचानक से खाली सीट हमारे सामने प्रकट हो जायेगी । अब अगर सीट ना मिलती है तो हम फिर वही कामचलाऊ ताऊ को ढूंढते है और उनसे जगह की रिकवेस्ट कुछ ऐसे करते है – “ इस सीट पर पांच बैठते है “, “ भईया अगले स्टेशन पर उतर जाऊंगा “ , “ कहा तक जाओगे ताऊ “ , या फिर अपना कंधा उससे अडा देते है के भाई तेरे उठते ही मैं बैठूंगा । हमारे देश का रेल नेटवर्क काफी बडा है और इतनी जनसंख्या इसी जुगाड के चलते रेल मे सफर कर रही है ।
  2. स्वाद अपने तरह का – हमारे देश मे तरह-तरह के व्यंजन बनते है । हर जगह का अपना स्वाद और मसाले है । हमारे देश मे कई साल तक अंग्रेजो का राज़ रहा और कई देशो के लोग हमारे यहा आते रहे । वो सभी अपने देश का स्वाद और व्यंजन अपने साथ लाये । हमने व्यंजन को तो जैसे के तैसा अपनाया परंतु उसके स्वाद मे ऐसा जुगाड लगाया के अब वो व्यंजन हमारे देश के नाम से फेमस हो गये है । इन्ही व्यंजनो मे से एक है नूडल्स,मंचूरियन, मोमो,फ्राईड राईस, सेंड्विच और मेगी । आज ये सब व्यंजन हमारे देश के नाम से फेमस है ।
  3. पेन मे रिफील फिट करना – ये काम तो हर भारतीय करता है , चाहे रिफील पेन के हिसाब से मिले ना मिले । हम उसे काट के अपने पेन मे एड्जस्ट कर ही देते है । कभी – कभी अगर इसके बाद भी रिफील सेट ना हो तो हम एक ओर जुगाड करते है, हम छोटे से कागज़ को फाड कर उसे रोल करके रिफील के आखिर मे एड कर देते है इससे अगर रिफील ज्यादा छोटी हो या ज्यादा कट गई हो तो भी एड्जस्ट हो जाती है ।

  1. अलमारी,फ्रिज या टेबल का बैलेंस बैठाना – उपर करे जुगाड का बडा रूप है किसी अलमारी,टेबल का बैलेंस बैठाना । अबकी बार कागज़ बडा और गत्ते का टुकडा होता है और इसे रोल ना करते हुये हम मोड कर टेबल के पैर के नीचे फसा कर काम चला लेते है । ये हमारे देश का सबसे बडे जुगाड मे से एक है जो हर कोई करता है । इसके साथ ही अगर हमारे दरवाजे का स्टापर खराब हो जाये तो हम एक पत्थर लगा देते है जो स्टापर की तरह काम करता है ।

7 . साबून का पूरा उपयोग – इस बारे मे शायद ज्यादा बताना ना पडे । गरीब हो या अमीर हर भारतीय ये काम करता है । जब साबून खत्म होने वाला होता है तो उसे या तो वाश बेसिन मे हाथ धोने मे लगा देते है या फिर उसे आखिर तक उपयोग करते है । इसी तरह का काम हम टूथपेस्ट , क्रिम, घी या दूध का पैकेट के साथ करते है । इनको हम काट के कुछ दिन लगाते है और पहले नीचे से फिर ढक्कन के तरफ से काट देते है । इसी कडी मे हम शैम्पू की बोतल मे आखिर मे पानी डाल के उपयोग करते है ।

  1. फटे बनियान का पोछा बनाना – ये शायद हर घर मे ना हो पर अधिकतर घरो मे फटे बनियान, पुराने कपडे या पूराने मोजे का उपयोग सफाई के काम मे ले लेते है । ये जुगाड काफी वक्त से चला आ रहा है ।
  2. पेन से कैसेट सही करना – ये नब्बे के जमाने के लोगो ने खूब किया हुआ है । जब भी कैसेट उलझ जाती थी तब हम एक पेन से उस पूरी कैसेट को सही करा देते है । अगर ये कैसेट किसी दुसरे देश मे खराब होती तो शायद फेक दी जाती परंतु हम उसे पेन से सही कर देते है । इस जुगाड से हमने कैसेट ना सही कई बार हम लाईट के साकेट मे वायर भी सेट कर देते है ।

  1. पार्किंग मे जगह ढूंढना – इसे हम जुगाड की जगह अगर अविष्कार कहे तो गलत नही होगा । हम बाज़ार जाये और गाडी पार्क करने के लिये जगह ना मिले ऐसा नही होता है । हम जो गाडी साईड स्टैंड पर लगी होती है उसे मैन पर लगा कर जगह कर लेते है । इसके अलावा कभी बीच मे थोडी सी जगह मे भी फसा देते है । अगर इसके बाद भी जगह ना मिले तो गाडी ऐसे खडी कर देते है के जो गाडीया सही से लगी है वो भी ना निकल पाये । आखिर मे हम कुछ ना मिले तो गाडी को आधी सडक पर खडी करके निकल जाते है ।

जुगाड हमे सिखाया नही जाता , ये हमारे खून मे है । हम अपने तरीको का उपयोग करके हमेशा समस्या का हल निकाल ही लेते है । ये सब इसिलिये है क्योंकी हमारे संस्कार मे है के हमे हमेशा बुद्धि का उपयोग करना चाहिये ।

This post is written for a contest at IndiBlogger.

Lufthansa-More Indian than You Think

दोस्त से ज्यादा, पर गर्लफ्रेंड,बायफ्रेंड से कम

कहाँनीया कब और कहा बन जाये हम कह नही सकते, पर एक ऐसी जगह है जहा हर रोज़ , हर पल एक कहाँनी जन्म लेती है । ये जगह शायद इसिलिये ही बनी है और फिर जो भी यहा आता है , वो खुद कई कहाँनीयो के जाल अपने दिमाग मे बुनते रहता है । ये जगह है “कालेज़” , कालेज़ दुनिया की एकलौती ऐसी जहा कई कहाँनीया, अलग अलग किरदारो के द्वारा रची गई है । एक ऐसी ही कहाँनी आज आप सबको बताने जा रहा हू  । इस कहाँनी के सारे किरदारो के नाम बदले हुये है पर ये कहाँनी एक सच्ची है और मेरे दिल के करीब है ।

आयुष ने 12वी मे अपनी आई.आई.टी की जमकर की और वो आई.आई.टी मे जाने का सपना 11वी कक्षा से देख रहा था । आयुष की कोशिश और उसकी मंजिल के बीच मे वैसे तो फासले कम थे, परंतु जो हुआ वो उसने भी नही सोचा था । आयुष का सपना टूट गया और आई.आई.टी के दुसरे पडाव मे वो फेल हो गया , खैर आयुष ने अपने शहर के ही एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज़ मे दाखिला ले लिया । कालेज़ के पहले दिन से लेकर तो अगले कुछ हफ्तो तक वो हर पल आई.आई.टी मैंस के पेपर के बारे मे ही सोचता था । जब एक महीना बिता तो आयुष का दिल नये कालेज़ मे लगने लगा , नये दोस्त और नयी जगह कई बार पुरानी यादो को भुलाने मे मदद करती है ।

पहले साल मे आयुष का रिजल्ट भी ठीक नही रहा और साथ ही आयुष को ये अहसास भी हो गया था के उसने अपनी कैपिबिलिटी से कम मेहनत की है । आयुष को कंप्यूटर का काफी शौक था और इंटरनेट पर उसकी मुलाकात हुई एक लड्की से हुई ,बातो –बातो मे पता लगा के वो लडकी उसी के कालेज़ मे , उसी के कोर्स मे दुसरे सेक्शन मे पढती है । आयुष ने उससे वादा किया के अब जब भी कालेज़ शुरु होंगे वो उससे मिलेगा । ना जाने क्यो आयुष के हाव भाव बदलने लगे , वो आयुष जिसने अपना आत्मविश्वास खो दिया था । वो एक अलग ही रंग और रुप मे कालेज़ गया और जाते ही उसने उसे ढुढना शुरु किया । उसने अपने खास दोस्त विशाल को लिया और कहा के चल भाई – “ जरा आते है “। विशाल ने पूछा – “ कहा जाना है “। आयुष ने उसी सारी बात बताई ,विशाल – “ अच्छा तो तू शिवानी के बारे मे बात कर रहा है और उसे ढूंढ रहा है “ आयुष –“ हा भाई तू जानता है उसे “ विशाल – “ जानता तो नही बस एक बार गरिमा ने मिलवाया था “।

आयुष अपने दोस्त विशाल के साथ गया और जब पहली बार उसने शिवानी को देखा तो बस देखता रहा गया । सिम्पल और सोबर , एक दम वैसी लडकी जैसी आयुष सपनो मे देखा करता था । उसे कुछ देर लगा जैसे ख्वाब देख रहा हो । शिवानी ने आयुष को देखा तो नही था । पर वो उसने उसे पहले ही ढूंढ रखा था । शिवानी –“ हलो आयुष ,कैसे हो “ आयुष – “मैं बढिया हूँ तुम कैसी हो “ शिवानी – “ आई.एम फाईन”. उसके बाद शिवानी आयुष को अपने समर वेकेशन के बारे मे बताती रही और वो सुनता रहा । आखिर मे आयुष ने कहा – “ शिवानी मे तुमसे कैन्टीन मे मिलता हू “शिवानी – “ओके माय फ्रेंड” ।

आयुष और शिवानी कुछ ही दिनो मे अच्छे दोस्त हो गये , दोनो अपनी हर बात एक दुसरे को बताते थे । आयुष ने शिवानी से कभी कहा नही पर आयुष मन ही मन शिवानी से प्यार करने लगा था । उसके प्यार करने का कारण सिर्फ शिवानी का स्वभाव नही था । शिवानी के कारण ही आयुष को अपना खोया आत्मविश्वास पा लिया था । आयुष ने सोचा के वो शिवानी से अपने दिल की बात कह दे पर उसने सोचा अगर शिवानी रुठ गई तो ।

short story-friendship and girlfriend

शिवानी ने भी आयुष से कभी कहा नही परंतु उसकी बातो से यही लगता रहा के वो भी शायद आयुष को चाहती थी । उस साल एक सबजेक्ट काफी कठिन था और पूरी क्लास मे सबको डर था के कही इस सबजेक्ट मे फेल ना हो जाये । ये डर शिवानी को भी था । शिवानी और आयुष साथ-साथ कभी पढाई नही करते थे क्योंकी आयुष अकेले पढना पसंद करता था । इसिलिये शिवानी ने इस सबजेक्ट से डर की बात आयुष को नही बताई । आयुष को जब बात पता लगी उसने शिवानी से कहा –“ तुम मुझे अपना दोस्त नही मानती “ शिवानी – “ नही आयुष ऐसी बात नही है “ आयुष- “तो तुमने मुझे नही बताया के तुम्हे इस सबजेक्ट मे दिक्क्त है , मैं तुम्हे पढा देता “ शिवानी – “आयुष तुम्हे ये सबजेक्ट आता है “ आयुष –“ हा आता है ,कल से मैं तुम्हे ये सबजेक्ट पढाऊंगा “

आयुष खुद उस सबजेक्ट मे कमफर्टेबल नही था परंतु उसे शिवानी को पढाना था तो बस लग गया वो पढने उसने एक रात मे 2 चैप्टर पढ डाले और फिर अगले दिन शिवानी को पढाया । धीरे-धीरे आयुष का पढाई मे इंटरेस्ट वापस आने लगा और जब उस साल का रिज्ल्ट आया तो आयुष ने क्लास मे तीसरी पोजिशन पाई । आयुष ने पूरी एक्जाम के दौरान शिवानी को पढाया और दोनो काफी वक्त साथ रहने लगे । सबको लगने लगा के ये दोनो एकदुसरे को चाहते है । अगले साल भी आयुष शिवानी को पढाता रहा और एक दिन उसने अपने दोस्त विशाल से कहा – “ आज मैं शिवानी को अपने दिल की बात बताने जा रहा हू “  विशाल –“  भाई मेरी बात माने तो रुक जा , मुझे लगता है ये थोडा जल्दी होगा “  आयुष और विशाल काफी अच्छे दोस्त थे, इसीलिये आयुष ने उसकी बात मान ली । एकदिन शाम को आयुष अपने दोस्त करण से मिलने गया । आयुष और करण स्कूल से साथ थे और करण आयुष के ही कालेज़ मे दुसरे कोर्स मे पढता था । करण को ये नही पता था के आयुष शिवानी को चाहता है । करण ने बातो – बातो मे कहा – “ यार वो शिवानी ,तो राज के साथ घुम रही है “ आयुष –“ कौन वो राज जो दुसरे शहर से हमारे कालेज़ मे पढने आता है “ करण –“ हा भाई वही वो मेरे कोर्स मे ही तो है “ आयुष –“ तो तू ये कहना चाहता है के वो दोनो एक दुसरे से …. “ करण – “ हा वो तो एक दुसरे को पहले साल से जानते है और तब से दोनो के बीच कुछ चल रहा था “  आयुष  के तो मानो पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गई उसे कुछ समझ नही आ रहा था । उसे दुख इस बात का नही था के शिवानी और राज़ एक दुसरे से प्यार करते है । उसे इस बात का गम था के जिसे वो अपनी अच्छी दोस्त मानता रहा उसने उससे ये बात छुपाई और सीधे –सीधे ना सही घुमा फिराकर शिवानी ने भी ये आयुष को दोस्त से बढकर माना था ।

आयुष कुछ दिनो तक कालेज़ नही गया । शिवानी ने भी उसे फोन किया पर उसने जवाब नही दिया , उसे लगने लगा था के शिवानी ने उसे धोखा दिया है । जब आयुष कुछ दिनो बाद कालेज़ पहुचा तो शिवानी और राज़ को साथ पाया । वो उन्हे दूर से देखकर निकल गया , उसी दिन कैंटिन मे शिवानी ने आयुष  से कहा – “ क्या बात है ,कहा थे इतने दिन “  आयुष – “ कही नही काम था “  शिवानी – “ हमे भी बताओ क्या काम था “ आयुष- “ नही बस काम था “  शिवानी-“ तो तुम हमें नही बताओगे, यही है तुम्हारी दोस्ती “ आयुष गुस्से मे था पर अपने को काबू कर के उसने शिवानी से वो बात पूछ ही ली । शिवानी कुछ देर तो हिचकिचाई और फिर कहा – “ऐसा नही है के मैं तुम्हे बताना नही चाहती थी पर सब अचानक ही हुआ “ आयुष ने शिवानी से कहा के – “तुम फिर हर दम मेरे साथ रहती थी , मुझसे ऐसे बात करती थी जैसे तुम मेरी गर्लफ्रेंड हो “

शिवानी ने जब ये सुना वो सब बात समझ गई और आयुष से कहा – “ तुम म्रेरे दोस्त से ज्यादा हो,पर बायफ्रेंड से कम हो “  ये कहने के बाद शिवानी वहा से चली गई । आयुष काफी देर तक ये सोचता रहा के आखिर ये कैसा रिश्ता है । उसने कभी इस रिश्ते के बारे मे नही सुना था ।

उसके बाद आयुष और शिवानी दोनो एक दुसरे के – दोस्त से ज्यादा, पर गर्लफ्रेंड और बायफ्रेंड से कम रहे “

“I am sharing a Half relationship story at BlogAdda in association with #HalfGirlfriend

मौत पर डिस्काऊंट है

मार्च का अंत आते –आते हर वर्ष काफी बद्लाव होते है. मौसम से लेकर फाइनेंस तक कई चीजो मे परिवर्तन होता है. मार्च के बाद कई चीजे महंगी होती है तो कई चीज़ो के दाम कम हो जाते है.इस बार मार्च के अंत मे फिर से कुछ चीजो के दाम कम हुये परंतु एक चीज़ के दाम मे अविश्वसनीय बदलाव हुआ और ये बज़ट मे प्रस्तावित भी नही है और सबसे बडी बात ये बद्लाव अप्रैल से पहले हुआ. सुप्रीम कोर्ट ने टू और फोर व्हीकल बनाने वाली सभी कपंनियो के बीएस-3 वाहनो के प्रोड्क्शन पर रोक लगा दी.सुप्रीम कोर्ट  ने काफी पहले ही इन कपंनियो को बीएस-3 वाहनो को बंद करने की तारीख के बारे मे बता दिया था, परंतु फिर भी कपंनियो ने इनका प्रोड्क्शन जारी रखा. 1 अप्रैल 2017 से बीएस-3 वाहनो की बिक्री पर रोक लगा दी गई है. मुर्ख दिवस के दिन सुप्रीम कोर्ट का ये समझदारी वाला फैसला पूरे भारत की जनता के लिये फायदेमंद रहेगा क्योंकी बीएस-3 के मुकाबले बीएस-4 वाहन कम प्रदूषण फैलायेंगे.

बीएस(भारत स्टेज़ एमिशन स्टैंडर्ड) भारत सरकार द्वारा लागू किया हुआ कानून है जो वाहनो से निकलने वाले धूये को नियंत्रित करता है. 1991 मे पेट्रोल और 1992 मे डीज़ल से चलने वाली ग़ाडियो के लिये पहली बार ये कानून बनाया गया था. ये स्टैंडर्ड यूरोपियन देश से प्रभावित थे और शुरु मे यूरो 2 नाम से लागू थे. 2001 से 2005 तक  पूरे भारत मे बीएस-2 नियम था और 2005-2010 तक बीएस-3. उसके बाद 2010 मे एन.सी.आर और 13 शहरो मे बीएस-3 वाहनो पर रोक लगा दी गई और अब 2017 मे पूरे भारत मे बीएस-3 वाहनो पर रोक लग गई है.

मार्च के आखरी दो दिन कपंनियो ने बीएस-3 वाहनो पर काफी छूट दी जो 5000 रुपये से शुरु होकर 25000 रुपये तक थी. जब ये खबर वाट्सएप के जरीये सब तक पहुची तब लगा मज़ाक होगा और आजकल वैसे भी त्योहार की बधाई एडवांस मे दी जाती है तो लगा इस बार मूर्ख दिवस की बधाई मे एड्वांस मे दी जा रही हो. परंतु जब कुछ होनहार और जाबांज़ लोगो ने शोरुम पर जाकर पता किया तो सच्चाई पता लगी दो चार तो जो आटो-टेम्पो से शोरूम तक गये थे. ग़ाडी के साथ ही वापस आये. धीरे-धीरे नही एकदम तेजी से ये खबर पूरे भारत मे फैल गई के हीरो और होंडा की बीएस -3 वाहनो पर भारी छूट मिल रही है. जो जैसा था और जहा था वहा से दौड लगा के शोरूम तक पहुचा उस वक्त उन्होने ना आटो वाले से दाम पूछे ना पेट्रोल पंप वाले से खुल्ले लिये. 30 और 31 मार्च को तो ऐसा लगा जैसे छ्प्पर फाड के उपर वाले ने सालो की मूराद पूरी की हो. जिसने आजतक साइकिल भी चार बार  सोच कर खरीदी उसने इन बीएस-3 वाहनो को खरीदने से पहले एक बार भी नही सोचा.

सुप्रीम कोर्ट  ने बीएस-3 वाहनो पर रोक इसलिये लगाई के इन वाहनो से प्रदूषण बहुत ज्यादा हो रहा था औरइससे भारत की जनता के स्वास्थ पर बूरा असर पडता.लेकिन सुप्रीम कोर्ट  ये नही जानती थी के अगर भारत मे मौत पर भी डिस्काऊंट मिले तो वो भी आंख बंद करके ले ले . अभी जब कुछ दिनो पहले नोट्बंदी के कारण जब ये सब लाइन मे लगे थे तो बहुत तकलीफ हो रही थी कहा जा रहा था हमारा पैसा है और हम ही उसे लेने के लिये परेशान हो रहे है और अब अपने पैसे से अपने स्वास्थ को बिगाड रहे है उसका मलाल नही है. इस छूट के दौरान पहले दिन कई शहरो मे सिर्फ पांच घंटो मे 2000-3000 वाहन बिक गये और कपंनी को कम ही सही मुनाफा तो मिला और हमे क्या मिला ?  जी हा हमे,  जिन्होने वाहन खरीदे वो भी और जिन्होने नही खरीदे उन्हे भी.

BS4 Vehicle

हालाकी डीलरो से कपंनीयो ने ये वाहन वापस लेने से मना कर दिये परंतु अगर डीलर्स भी जागरुकता दिखाकर सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी बात थोडा पहले रखते और इन वाहनो को नही खरीदते तो सुप्रीम कोर्ट इन वाहनो का प्रोड्क्शन पहले रुकवा  सकती थी .

एक साथ लाखो बीएस-3 वाहन सिर्फ दो दिन मे सडको पर उतर गये और हमने आने वाले हमारे भविष्य के मौत खरीदी  वो भी डिस्काऊंट पर .अगर अब सुप्रीम कोर्ट  कह दे इन वाहनो को वापस करके कम दामो पर बीएस -4 वाहन खरीद लिजिये तो वो सभी लोग फिर से सडको पर आयेंगे परंतु इस बार विरोध करने के लिये और उपर से यमराज़ जी मुस्कुरा और सोच रहे होंगे जिंदगी कितनी सस्ती हो गई है.हम अक्सर अपने स्वार्थ को उपर रखते है. देश और समाज़ के बारे मे बाद मे सोचते है. अगर इन वाहनो को डिस्काऊंट पर कोई नही खरीदने जाता तो बाद थोडे पैसे ज्यादा लग जाते पर हम मौत नही खरीदते.