हमारे अपने बिंदास नेहराजी

क्रिकेट के खेल मे कई उतार चढाव होते है और इसिलिये इसे अनिश्चित्ताओ का खेल कहा जाता है । भारतीय क्रिकेट मे कई एक से बढकर महान खिलाडी आये और उन खिलाडीयो के शुरुवाती दौर से लेकर उनके खेल के करियर के आखिर तक हम सोचते है के ये खिलाडी अभी ओर आगे खेले और देश का नाम रोशन करे । इन सबके बीच कुछ खिलाडी ऐसे भी है जो महान खिलाडीयो की श्रेणी मे नही आ पाये पर जब-जब वो खेले उनका खेल हमेशा उच्च स्तर का ही रहा है ।

आशीष नेहरा उन्ही खिलाडीयो मे से एक है । नेहराजी के नाम से मशहूर इस खिलाडी का जन्म 29 अप्रैल 1979 को दिल्ली मे हुआ । नेहराजी एक टिपीकल दिल्ली के लडके से बिलकुल अलग है ।एकदम सिम्पल और अपने मन की करने वाले नेहराजी ने 1997-98 मे दिल्ली के लिये घरेलू क्रिकेट मे  डेब्यू किया था । दुबले-पतले नेहराजी गेंद को दोनो ओर स्विंग कराने मे माहीर है । 24 फरवरी 1999 को पडोसी देश श्रीलंका के खिलाफ़ उन्होने अपने टेस्ट करियर का आगाज़ किया था  और 21 जून 2001 को जिम्बाब्वे के खिलाफ एकदिवसीय करियर का आगाज़ किया । नेहराजी ने जिम्बाब्वे के इस दौरे पर जो कहर ढाया था उसे आज भी सब याद करते है । उन्होने उस दौरे पर अपनी स्विंग गेंदबाजी से हर बल्लेबाज़ को नचाया और भारत को विदेशी जमीन पर 15 साल बाद टेस्ट जीतने मे मदद की ।

Nehraji


नेहराजी का असली जादू साऊथ अफ्रीका मे विश्व कप 2003 मे देखने को मिला जहा उन्होने दुनिया के हर बल्लेबाज़ को अपनी स्विंग गेंदबाजी से परेशान किया । खासकर इंग्लैड के खिलाफ डरबन मे उन्होने जो गेंदबाजी की वो आजतक हम सबके ज़ेहन मे है । उस दिन ऐसा लग रहा था के गेंद सिर्फ और सिर्फ उनकी ही बात सुन रही थी । उस मैच मे भारत ने 9 विकेट पर 250 रन बनाये थे । जवाब मे इंग्लैड के 2 विकेट सिर्फ 18 रन पर गवा दिये थे । उसके बाद नासिर हुसैन और माइकल वान क्रिज़ पर टीक गये और लगा के ये दोनो आसनी से मैच निकाल देंगे पर तब तक नेहराजी का जादू बचा था । सबसे पहले नेहराजी ने एक शानदार आऊट स्विंगर डाल कर आऊट किया और फिर जो फालो थ्रू मे उन्होने किया वो गेंद की स्विंग को बता रहा था । अगली गेंद पर उन्होने अपनी स्टाक बाल डाली जो दाये हाथ के बल्लेबाज के लिये पड्कर अंदर की ओर आती है और एलेक स्टूवर्ट के कुछ भी समझ नही आया और इंगलैड ने दो गेंदो पर दो विकेट गवा दिये । नेहरा जी ने इस विकेट के बाद दादा को इशारे मे बताया भिया ये भी डाल सकते है अपन । नेहराजी ने दो ओवर बाद फिर से बाहर जाती हुई गेंद डाली और माइकल वान को चलता किया और फिर से फालो थ्रू मे गेंद की स्विंग को बताया । अगर आपने वो मैच देखा हो तो नेहराजी ने जो चौथा विकेट लिया ।  वो गेंद एक बेहतरीन गेंद थी । पिच पर पड्कर गेंद ने तेजी से कांटा बदला और कोलिंगवूड के बल्ले का किनारा लेकर गेंद नेहराजी ने बचपन के दोस्त सहवाग के हाथो मे फर्स्ट स्लिप मे चली गई और सहवाग ने बचपन मे नेहराजी का नाश्ता खाने का हिसाब चुका दिया । इस बार उन्होने फालो थ्रू मे कुछ नही किया शायद उन्हे भी आश्चर्य हुआ इस गेंद के इतने स्विंग होने पर । इसके बाद बाकी विकेट नेहराजी के आसान हो गये क्योंकी इंग्लैड के बल्लेबाजो उनकी गेंदे समझ नही आ रही थी । वाईट और इरानी को बेहतरीन आऊट स्विंग से आऊट करके उन्होने विश्वकप मे भारतीय गेंदबाजो का तब तक का सबसे बढिया प्रदर्शन किया ।

 उन्होने उस मैच मे 6 विकेट लिये मात्र 23 रन देकर । इसके अलावा उन्होने उस विश्व कप मे 149.7 कि.मी /घंटे की रफ्तार से गेंद फेकी थी जो उस वक्त किसी भी भारतीय तेज़ गेंदबाज़ के द्वारा फेकी गई सबसे तेज़ गेंद थी ।

इस विश्वकप के बाद दुबले-पतले नेहराजी को इंजुरी ने पकड लिया परंतु 2004 मे उन्होने वापसी जब ज़हीर खान आस्ट्रेलिया के दौरे से बाहर हो गये थे । परंतु उस समय वो फिर से वही शानदार प्रदर्शन दोहरा नही पाये । नेहराजी इंजुरी के कारण कई बार टीम से बाहर रहे और इसी इंजुरीस के कारण उनके प्रदर्शन मे निरंतरता नही रही । लेकिन उन्होने कभी हार नही मानी जब वो पूरी तरह से फिट होकर वापस लौटे तो उन्होने आई.पी.एल मे धूम मचाई और शुरुवाती ओवर्स मे बल्लेबाजो परेशान करने वाले नेहराजी डेश ओवर के भी स्पेश्लिस्ट बन गये । इसी के बदौलत वो फिर से टीम मे वापस आये और शानदार गेंदबाजी के साथ उन्होने नये गेंदबाजो के संग अपना अनुभव भी बाटते रहे । 2011 विश्वकप मे भी वो शानदार फार्म मे थे परंतु सेमिफाइनल मे उन्हे फिर से चोट लगा गई और वो फाइनल नही खेल पाये । 1999 से खेल रहे नेहराजी कल 1 नवबंर 2017 को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह देंगे । न्यूजीलैण्ड के खिलाफ कल होने वाला टी-20 उनका आखरी अंतरराष्ट्रीय मैच होगा साथ ही अब इसके बाद वो आई.पी.एल भी नही खेलेंगे ।

नेहराजी ने अपने  18 साल के करियर मे 17 टेस्ट मैच खेले और 42.40 की औसत से 44 विकेट लिये है । उन्होने 120 एकदिवसीय मैचो मे 157 विकेट लिये है और 25 टी-20 मैचो मे 34 विकेट लिये है ।

नेहराजी 2003 और 2011 के विश्वकप मे भारत की टीम का हिस्सा थे, साथ ही दो एशिया कप और तीन चैम्पियन ट्राफी मे भी भारत की टीम के साथ थे ।

नेहराजी के बारे मे कई बाते है जो बडी ही इंटरेस्टींग है जैसे कोहली को स्कूल क्रिकेट मे प्राईज़ देना, सोशल मिडिया से दुरी और ऐड्वाईस देना । उनके बारे मे मशहूर है के अगर उन्होने किसी गेंदबाज़ को कोई एड्वाईस दी तो वो फेल नही होती ।

नेहराजी भले ही महान क्रिकेटर नही बने परंतु अपनी चालकी और स्विंग से हमेशा बल्लेबाज़ो को परेशान करते रहे उनका अनुभव आने वाले समय मे नये तेज़ भारतीय गेंदबाजो के काफी काम आ सकता है ।

तिरभिन्नाट पोहा- इंडिया व्र्सेज आस्ट्रेलिया

 “यार उमेश बोत दिन हुये ये पप्पू भिया नी दिख रे है “ –रितिक ने कहा । “ हा यार मैं भी काम के चक्कर मे उधर जा नी पा रिया हू ने फिर शाम को पानी आ जाता है नी तो फिर अपन कहा पप्पू भिया को ढूढो “ –उमेश ने कहा । रितिक –“ क्यो रे गेलिये पानी का पप्पू भिया से क्या लेना देना “ । उमेश-“ अरे यार पिछले साल बारिश गिरे ने के पप्पू भिया का फोन आये , ने फिर मेरे से के चल चले अड्डे पे “। रितिक –“ अबे तो दारू हीच तो पीने का के रिये थे कौन सा तेरे को तीर्थ करवा रिये थे “। उमेश-“  अबे नी यार , तू समझियो कौणी , पप्पू भिया शुरु के 2-4 पैक तो ऐसे पीये जैसे कोई मैजिक सिगनल खुलते ही दौडे ,ने फिर उने चढ जाये ने फेर अपणा नी पीन दे, बार –बार दे लप्पड- दे लप्पड ने के दारू पीना बूरी बात है “। रितिक ने दूर से पप्पू भिया को आते देखा और कहा –“अरे नी यार अपने पप्पू भिया ऐसे नी है वो तो सज्जन आदमी है , पीयो और पीने दो मे विसवास रखते है रे “। पप्पू भिया उमेश के पीछे आकर खडे हुये और रितिक को चुप रेने का इशारा किया । उमेश –“अबे गेलिये तेरे को सज्जन दिखते है , तू और पप्पू भिया दोनो ही सर्किट हो “। ये कहते हुये उमेश पलटा और पप्पू भिया को देख के जो उसकी आवाज़ अब तक न्यूज़ रिपोर्टर की तरह फर्राटे से चल री थी वो एक नर्वस इंटरविव देने वाले सरीकी हो गई । उमेश-“  अरे भिया मैं तो के रिया था के पप्पू भिया हमारी बिमारी , हमारा दर्द अपने पास रख लेते है , जैसे भगवान भोलेनाथ ने विष पिया था वैसे ही ये हमे बचाने के लिये दारू पी लेते है “। पप्पू भिया ने ये सुनते ही दो लप्पड उमेश को लगाये और कहा –“ गेलिये भोलेनाथ का मज़ाक उडाता है “।

रितिक –“अरे भिया इसे छोडो ने ये बताओ कहा थे इत्ते दिन , ने वो मैच है यार कल ने कोई टिकीट की जुगाड नी हुई भिया “। पप्पू भिया-“ अरे रितिक , इसीज़ काम से तो गिया था मैं “। उमेश –“भिया इतना टेम तो शादी के कारड प्रिंट करवाने मे नी लगता उससे ज्यादा तुम्हे मैच के टिकीट प्रिंट करवाने मे लग गिया, क्या हाथ से पैंट कर रिये थे क्या “। पप्पू भिया को फिर गुस्सा आ गिया और दे लप्पड –दे लप्पड उमेश को । पप्पू भिया – “ अबे नी बे बारिश एक तो अपने इधर होई नी तो पेले मे रिशीकेश के जंगल मे गया ने वहा अभी सिहस्थ मे दो चार बाबाओ से अपनी जो भेट हुई उनसे मिला ने बारिश का उपाय पूछा । फिर जो उपाय बताया तो किया अपन ने उपाय दो दिन बाद मैंने पेपर मे पढा के इंदौर मे जोरदार बारिश हुई । पर अपन क्या थोडा ज्यादा मे विसवास रखते है तो अपन ने उपाय मे सामग्री ज्यादा डाल दी जैसे अपन जीरावन ने सेव डालते है नी वैसे , इसिलिये तो बारिश अब तक हो री थी । “


रितिक- “ वा भिया तुम तो बहुत पोचे हुये निकले पर फिर  बारिश तो रुक गी थी और फिर भी तुम काफी दिन मे आये , वही रुक गे थे क्या भिया “। पप्पू भिया –“ नी बे , वो वापसी मे आ रिया था वो  रवी का फोन आया ने किया के यार मैच है तुम्हारे यहा ने पानी गिर रिया है और बोले के अपन सोच रे है पेले तीन जीत के सिरीज़ जीत ले तो फिर नये छोरो को चानस देंगे । अब अपना दिमाग फिरा अपन ने फिर उस बाबा को जैसे तैसे ढूंढा ने बारिश को भारत मे दुसरी जगह करवाने का उपाय किया और फिर रुका पानी “। उमेश- “भिया मान गये , तुम्हारे पैर कहा है , छूना है “। पप्पू भिया- “रेनदे , सैंडविच पर घी मत लगा “। रितिक- “ भिया वो सब ठीक है पर ये रवि कौन है और कौनसे मैच की के रिया था , कही वो अपना मरीमाता वाला तो नी “। पप्पू भिया – “नी रे ऐबले , मैं रवि शास्त्री की के रिया हू , भारत की क्रिकेट टीम का कोच “। उमेश – “तो भिया तुम फिर तो रेडिसन गये होंगे कल “। पप्पू भिया – “ हओ रे , ऐयरपोर्ट से रेडिसन के बोत चक्कर लगे ने उसके पेले अपन राजबाडे मे बरसाती वाले के यहा गिये ने उसको आर्डर दिया ने बास वाले से बास और चार छोरे लेके ,स्टेडियम के उपर बांध दी बरसाती ने उसकी रस्सी अपांयर को दे देंगे, जैसे आजादी वाले दिन झंडा फेराते है नी बस वैसे ही पानी आते ही अपांयर रस्सी खेंच देंगे ने बरसाती से पूरा स्टेडियम ढंक जायेंगा ।“  रितिक –“ गजब भिया, तुम या क्या कर रे हो तुमे तो मतलब साईटिस होना था “। पप्पू भिया- “अबे अब समाज सेवा कौन करेगा अगर मै साईटिस बन जाऊ तो “। उमेश –“ भिया पिलेयर से मुलाकात हुई के नी किसी से “। पप्पू भिया-  “अबे क्या के अब, सबके अपने स्टाईल का खाना  धोनी भिया के लिये सुबह चार बजे उठ के ने वो पाटीदार से 6 लीटर दूध लाया,कोहली भिया को ना जाने कौनसी मछ्ली चिये थी ने पिछली बार उनने इस चक्कर मे पोहे नी खाये तो फिर मछली बज़ार जाके ने मछली लाये ने वो मछली भी उज्जैन के एक तालाब मे मिली बताओ अब । ने फिर कुछ पिलेयर तो अपने सज्जन है जैसे रहाणे उसको खजराना जाना था उसको अपन ने वहा पोचा दिया ने बढिया पूजा करवा दी । अब एक वो पांड्या , अजब स्टाईल कर रखी है उसने मैंने रवि भिया से की थी के यार इसको सही करवा दो कही पुलिस परदेशीपुरा का समझ के धर नी ले पर नी माना,निकल गिया अकेले बजार मे ,अब अपने यहा की पुलिस बोत स्ट्रिक्ट है ।तो धर लिया फिर वा जाके उसे छुडाया । “ उमेश –“ भिया  भिया भिया” । पप्पू भिया-“ हा यार उमेश अब क्या करे करना पडता है अच्छा कल मैच के बाद रात को दो बजे सराफा आ जाना उधर अपन ने  एक पार्टी रखी है दोनो टीम के पिलेयर आयेंगे ने जम के करेंगे नाश्ता , वो आस्ट्रेलिया वाले तो मान गे फिर विराट भिया को भी समझाया के फिटनेस ठीक है पर कभी- कभी चलता है ने फिर अपने इंदौर का स्वाद भी गजब है और आखिर मे अपन ने रामबाण फेका और अनुष्का भाभी से केलवा दिया फिर तो मानना ही था , क्यो है ना रितिक और उमेश “।

रितिक और उमेश पप्पू भिया को दंडवत प्रणाम कर रे थे ।

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तिरभिन्नाट पोहा-पप्पू भिया का रिजाईन

तिरभिन्नाट पोहा-इसके बिना जिंदगी खत्म भिया

तिरभिन्नाट पोहा-पप्पू भिया का लैपटाप

कुछ दिन तो बिताओ दादा-दादी और नाना-नानी के घर

इस दुनिया मे जब हम आते है । कई सारे रिश्तो से जुड जाते है । इन्ही सब रिश्तो मे एक रिश्ता होता है । दादा-दादी और नाना-नानी का और अगर सच कहू तो ये एक ऐसा रिश्ता है जहा शायद हमे सबसे ज्यादा प्यार मिलता है । चाहे आप इस दुनिया के छुट्टीया मनाने कही भी चले जाये परंतु गर्मियो की छुट्टीयो मे दादा-दादी और नाना-नानी के घर जाना सबसे बेहतर समर होलिडे होगा । हर कोई अपने दादा-दादी और नाना-नानी के साथ समय बिताना चाहता है ।

जब हम छोटे थे तब शायद इतना हम ये नही सोचते के हम अपने माता-पिता के माता-पिता के साथ समय कैसे बिताना चाहते है । फिर जब नौकरी लगती है और ज्यादा वक्त जीवन की आप-धापी मे जाता रहा  । तब इस बात के बारे मे सोचते है के अगर मौका मिले या ये कहे के काश छुट्टीया मिले तो कुछ वक्त उनके साथ गुज़ारे ।

एक दिन दादाजी-दादीजी के साथ

दादाजी-दादीजी के संग वक्त गुजारने का अपना ही मज़ा है । उस वक्त हमे जो किस्से कहानिया सुनने को मिलते है । वो शायद ही कही और सुनने को मिले । मैं अपने दादाजी के साथ अपने गाव “कैथूली” जाना चाहता हू । वहा जाकर उनके संग उन गलियो मे घुमना चाहता हू । जहा उन्होने अपने जीवन के कई साल बिताये है । दादाजी के खेत पर जाकर उनसे वहा  उगने वाली फसलो के बारे मे जानना चाहता हू । खेत मे पानी कैसे देते है और साथ ही कैसे आखिर पुराने वक्त मे यहा खेती हुआ करती है सब जानना चाहता हू । फिर उसके बाद हम कैथूली के ही पुराने मंदिर मे बैठेंगे और उस वक्त मुझे दादाजी गाव के कई लोगो से मिलवायेंगे । आप माने या ना माने जितने खुशी से गाव के लोग किसी से मिलते है जो आदर सत्कार वो लोग करते है । वो हम शहर वालो के लिये काफी मुश्किल है । दादाजी के संग दिन का वक्त बिताने के बाद फिर जब हम घर जाये तो दादीजी के हाथ के बने घी के पराठे और बेसन का स्वाद दुनिया के किसी भी होटल से बेहतर होगा । खाने के बाद फिर घर मे जो पेड लगा है उसकी छाव मे एक प्यारी सी नींद लेने का मज़ा भी बहुत आयेगा । गाव मे अक्सर जब भी कोई मेहमान आता है तो उसे आस-पडोस वाले अपने घर पर जरूर बुलाते है । दिन की इस नींद के बाद इसी का सिलसिला शुरु होगा । शाम के वक्त गाव की एक सैर और साथ ही चौपाल पर बैठकर दादाजी और बाकी बुजूर्गो की बाते और अनुभव इस दिन का अंत शानदार बना देंगा । रात मे ना तो पंखा ना ऐसी और ना बिस्तर की जरुरत लगेगी क्योंकी गोबर से लेप किये हुये फर्श की ठंडक इन सबसे बेहतर होगी । दादाजी तो अब इस दुनिया मे नही है परंतु मैं और दादीजी जब भी गाव जायेंगे दादाजी हमारे साथ हमारे दिल मे वही होंगे ।
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एक दिन नानाजी-नानीजी के साथ

मेरे नानाजी और नानीजी दोनो ही शिक्षक थे । अब जब मैं शामगढ उनके घर जाता हू तो जो सुकून और चैन मिलता है  वो कही और ढूंढना मुश्किल है । नानाजी और नानीजी के दिन की शुरुवात सुबह 5 बजे से होती है । सुबह 6 और 8 बजे के समाचार नानाजी के रेडियो पर सुनना कई न्यूज़ चैनलो की न्यूज़ से बेहतर होता है । नानाजी के घर के सामने ही पोहे की दुकान है । 8.30 बजे जैसे ही वहा पोहे और समोसे तैय्यार होंगे । नानीजी किसी को भेजकर पोहे और समोसे मंगवा लेंगे । नानाजी एक लेखक भी है । पोहे और समोसे खाते खाते उनके साथ लेखन की बारिकी को सिखना और उनसे कहानिया सुनने मे बडा मज़ा आयेगा । नानीजी के हाथ का बना अचार दुनिया मे बने किसी भी सास और अचार से बेहतर होता है । खासकर नींबू का अचार । दिन के खाने मे वो अचार खाने का स्वाद 100 गुना बढा देता है । शाम के वक्त नानाजी रेलवे स्टेशन पर घुमने जाते है और साथ होता है उनका वही रेडियो जिस पर सिर्फ आधे घंटे मे आप सारी खबरे जान सकते हो । जिसे जानने के लिये आपको टीवी पर शायद घंटो लग जाये । नानाजी –नानीजी के साथ शाम का समय उनके अनुभव और पुराने किस्से सुनने मे बितेगा और रात को खाने के बाद छत पर बैठकर नानाजी कहानी सुनायेंगे । नानाजी काफी अच्छे कहानी वक्ता है ।

ये जो दो दिन मैं बिताऊंगा उन दो दिन मैं अपने संग मोबाईल नही रखुंगा और फिर भी मुझे लगेगा के दिन जल्दी बित गये ।

ये पोस्ट मैं अपने दादाजी-दादीजी और नानाजी-नानीजी को समर्पित करना चाहता हू ।

#LoveJatao
I look forward to hear from you how would you celebrate Grandparents Day.


I look forward to hear from you how would you celebrate Grandparents Day. Do share a selfie with your grandparents on Sept. 10, 2017 on Twitter or Facebook with #LoveJatao & tag @blogadda to win a goodie from Parachute Advansed

कुछ किताबे तुम जैसी है

कुछ किताबे तुम जैसी है । पुरी होने पर भी अधुरी सी है । उनके हर पन्ने पर एक निशान बनाया है मैंने और ये निशान तुम्हारे साथ बिताये लम्हो की यादे है । किताब मे कुल मिलाकर बस 365 पन्ने है । हर पन्ने को हर दिन एक –एक करके पढता हू और जिस साल मे 366 दिन होते है, उस दिन उस साल एक खास पन्ने को दो दिन तक पढ्ता हू । ये वही पन्ना है जिसमे किताब के हीरो ने हीरोईन को पहली बार मेले मे देखा था । तुम्हे याद है वो मेला जब तुम वो रिंग वाले स्टाल पर उस ताजमहल की मूरत को पाने की कोशिश कर रही थी और जब-जब तुम कामयाब नही हो रही थी तो गुस्से मे सर को जोर से हिला रही थी । जिसके कारण तुम्हारी जुल्फो से एक लट बाहर आ जाती थी । ये लट तुम पर बहुत खूबसूरत लग रही थी ठीक वैसे ही जैसे किताब मे किस पन्ने तक पढा है वो याद रखने के लिये एक रेशम सा चमकदार धागा होता है ।  वो धागा जैसे किताब की खूबसूरती मे चार चांद लगा देता है । ठीक वैसे ही वो लट तुम्हारी खुबसूरती को बढा रहा थी । या तो उस दुकान वाले की उम्र ज्यादा होगी या फिर वो अपनी बीवी या गर्लफ्रेंड से डरता होगा । वर्ना मै उसकी जगह होता तो अपने हाथो से वो ताज़महल तुम्हारे हाथो मे रख देता । मैं चाहता तो वो ताजमहल भी जीतकर तुम्हे उस वक्त दे देता । परंतु तुम उस ताज़महल से ज्यादा खूबसूरत हो और फिर असली ताजमहल भी तुम्हारी ही तरह खूबसूरत मुमताज़ की याद मे बनाया गया था ।
Love Story
तभी अचानक मेरी किताब के पन्नो को तेज़ हवा ने पलट दिया और वो उस पन्ने पर ले आयी जो उस किताब का सबसे अनमोल पन्ना था । वैसे उस पन्ने पर शीर्षक कुछ और था , परंतु मैंने तो उसे “ इज़हार” ये नाम दिया था । अब तुम समझ ही गयी हो मैं किस दिन की बात कर रहा हू । ये वही दिन है जब मैंने ये ठान लिया था के आज तुमसे दिल की बात कह के ही रहूंगा । वैसे मैंने इस दिन की तैय्यारी काफी की थी । इस दिन से ठीक एक महीने पहले अपने दोस्तो मे से किसी एक को तुम समझता और इज़हारे इश्क की प्रेक्टिस किया करता था । वैसे दोस्तो को तुम समझना काफी मुश्किल था पर और करता भी क्या ? अच्छा वैसे मेरे कालेज़ की ही एक लड्की जो मेरी अच्छी दोस्त थी ,  उसने कहा तो था के मैं प्रेक्टिस उसके साथ कर लू पर झूठ मे ही सही मैं तुम्हारे साथ बेवफाई नही कर सकता । आखिरकार वो दिन आ ही गया था । डर तो था मन मे के अगर तुमने मना कर दिया तो आगे की जिंदगी कैसे बिताऊंगा क्योंकि मैं भारतीय सिनेमा का वो विलेन नही था जैसा रोल शाहरुख खान ने डर मे किया था । मैं कैंटिन मे ठीक वक्त पर पहुच गया था और वही बैठा था जो तुम्हारी सबसे फेवरेट जगह थी । मेरे दोस्त तुम्हारे घर से लेकर कैंटीन तक आने की सारी खबर अपडेट दे रहे थे । उस दिन ना जाने क्यो तुम घर से देर से निकली और तुम्हारे इंतेजार मे पहले 2-4 चाय पी फिर 2 कोल्ड्रिंक । फिर लगा के कही कोल्ड्रिंक के कारण ज्यादा डकारे ना आ जाये तो फिर चाय पी ली । ये तुम्हारे इश्क का ही नशा था के ओर कुछ उस दिन असर ही नही कर रहा था ।

आखिरकार तुम आ गई और तुम उस पिंक सलवार-कुर्ते मे बहुत अच्छी लग रही थी । तुम जैसे ही टेबल के पास आयी मैं उठा और वहा से चल दिया । तुमने शायद इतना ध्यान नही दिया । मैं कुछ दुर जाकर काउंटर से फूल ले आया और बस वही फिल्मी अंदाज़ मे घुटनो पर बैठकर कर दिया अपने इश्क का इजहार । वैसे तुमने कुछ देर तो आश्चर्य से देखा , मेरे हाथ से फूल लिया और अपनी बुक मे उसे रखकर चल दी । तुम्हारे चेहरे पर मुस्कुराहट नही थी । मैं बडा उदास था , समझ नही आया के अब क्या करू । अचानक इसी सोच मे वो किताब मेरे हाथो से गिर गई और जब उसे उठाया तो किताब का वो पन्ना हाथ मे आया जब उस लडके से लडकी कुछ दिन बाद मिलकर अपना फैसला बताती है । तुम उस फूल को लेकर मेरे पास आई थी जो मैंने उस दिन तुम्हे दिया था । मुझे लगा के अगर तुमने इतने दिन तक अगर फूल सम्भाले रखा है तो जरुर कोई खास बात होगी ।  तुमने जो कहा वो अद्भुत था क्योंकी वो हर लडके ने सुना जरुर था । परंतु अपनी जिंदगी मे अपने इश्क से कभी सुनना पसंद नही करता । तुमने मेरे फूल को वापस देकर बस यही कहा के तुम मुझसे इश्क नही कर सकती । फूल जैसे ही मैंने हाथ मे लिया वो टूट्कर बिखर गया था । वैसे इस ना के कारण तो कई थे परंतु मैंने उसे जानना नही चाहता था ।

इसके आगे मैंने उस किताब को कभी पढा नही , दोस्त ने पढी है वो किताब कह रहा था के उस किताब के अंत मे हीरो –हीरोईन मिल गये थे । दोस्त जब –जब उस किताब के उस पन्ने का जिक्र करता था जिसमे वो लडका और लडकी कालेज़ खत्म होने पर मिलते है । तब –तब मुझे वो दिन याद आ जाता था जब कालेज़ के 3 साल बाद मैंने तुम्हे कैफे मे देखा था । दिल तो किया के तुमसे कारण पूछ लू मगर लगा के तुमने जो किया गुनाह तो नही था । इसके अलावा मैंने उस किताब के किसी ओर पन्ने के बारे मे किसी से जिक्र नही किया क्योंकि मेरे लिये तो किताब वही खत्म हो गई थी ।  

कुछ किताबे तुम जैसी है । पुरी होने पर भी अधुरी सी है ……..

ये कहानी आपको कैसी लगी बताईयेंगा , ये कहानी एक लेटर की तरह है जो एक लडके ने एक लड्की को लिखा है । .