धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया,
जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया

इंसान ही इंसान को जानवर कह रहा हैं,
जानवरो का तो गोश्त खा रही हैं दुनिया

ना अपने की फिक्र,
ना पराये की खुशी,
सिर्फ “ मैं ” मे सिमट गई हैं दुनिया

धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया,
जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया

कांच के टुकडे पर कोई चलता नही,
पत्थर घरो पर एक दुसरे के फेकती हैं दुनिया

मुस्कुराकर ना चलना यहा कभी,
जलन के मारे जलती हैं दुनिया

अच्छाई को सुंघती भी नही,
बुराई से पेट भरती हैं दुनिया

धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया,
जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया

कोई लडे तो पिछे खडी हो जाती हैं,
अकेले मे तो खुद के ही लब सील लेती हैं दुनिया

कभी चादर भरोसे की ओढ मत लेना,
छेद गद्दारी के करती हैं दुनिया

धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया,
जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया

अपनी मंज़िल का पता सबको ना बताना यहा,
आंखे फोडकर सपने चुराती हैं दुनिया

कभी विद्वान खुद को समझना ना यहा
कदम कदम पर पाठ पढाती हैं दुनिया

धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया,
जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया
(चिराग)

Categories: Poems

9 Comments

Alok Mohan · 27/05/2012 at 11:31 pm

जितनी तारीफ करु कम है
सुपर कविता

Bharat Bhushan · 28/05/2012 at 4:40 am

अब यह लगने लगा है कि इमानदार लोग ही धोखेबाज़ हैं जो सच को स्वाकार नहीं कर रहे और ख़ुद को धोखा देते हैं :))

sushma 'आहुति' · 29/05/2012 at 12:16 am

बहुत ही खुबसूरत….. भावो का सुन्दर समायोजन……

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी · 29/05/2012 at 12:16 am

उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति…बहुत बहुत बधाई…

Where thoughts are Word$ · 29/05/2012 at 7:20 am

Awesome!!!! 🙂 🙂

Kavita Rawat · 29/05/2012 at 7:20 am

सच कहा आपने बहुत फूंक फूंक कर कदम न रखें तो जीना दुश्वार होते देर नहीं लगेगी ..
..दुनिया से समय से चेत जाने की अच्छी नसीहत भरी रचना

Reena Maurya · 04/06/2012 at 12:30 am

bahut hi behtarin likha hai apne..
lajavab..:-)

संजय भास्कर · 04/06/2012 at 10:47 pm

बहुत अच्छे से अपने भावों को व्यक्त किया है आपने!

संजय भास्कर · 04/06/2012 at 10:47 pm

बहुत सुन्दर ……मन खुश हो गया पढ़ कर

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