मेरे हर सफ़र का साथी था वो
ना जाने कब हवा चली और धुँआ हो गया वो
 
मेरी हर नजर का  दर्पण था वो
ना जाने कब धुप गई और अँधेरा हो गया वो
 
मेरी चादर का एक किनारा था वो

ना जाने कब रास्ते में काँटा आया और फट कर चिंदी हो गया वो

मेरी रात का एक सपना था वो

ना जाने कब सुबह हुई और टूट गया वो
missing-someone
 
मेरी गजल का गायक था वो
ना जाने कब स्याही ख़त्म हुई और बेसुरा हो गया वो
 
मेरी आँखों में लगा सुरमा था वो
ना जाने कब आंसू आये और बह गया वो 
 
मेरी तारीफों का पुलिंदा था वो
ना जाने कब शोहरत गई और गुम हो गया वो 
 
मेरी नाजुक हथेलियों में लकीर था वो 
ना जाने कब बारिश हुई और मिट गया वो 

मेरी जिंदगी की पहचान था वो
ना जाने कब मौत आई और दफ़न हो गया वो
 

(चिराग )
 
Categories: Poems

12 Comments

दीप्ति शर्मा · 04/01/2012 at 9:37 am

bahut khub chirag
is moke par m apni kuch panktiya likhti hu
" vo to chala hi gya ,
jise jana tha
tu na use yaad kar
apna jivan tu
uske liye na barbad kar"
_ deepti sharma

निवेदिता · 06/01/2012 at 1:55 am

गहन अभिव्यक्ति ………..

chirag · 06/01/2012 at 1:58 am

@deepti thanks and nice lines good

chirag · 06/01/2012 at 1:58 am

@nivedita ji
thanks a lot

hridyanubhuti · 07/01/2012 at 8:18 am

पर उम्मीद में है बसा अब भी वो…
खूबसूरत रचना।

chirag · 07/01/2012 at 8:20 am

@induravisinghji thanks a lot

संजय भास्कर · 08/01/2012 at 8:29 am

अपने सुन्दर लेखन से आप ब्लॉग जगत को सदा ही
आलोकित करते रहें यही दुआ और कामना है.

आपसे परिचय होना वर्ष २०११ की एक सुखद उपलब्धि रही.

Priyankaabhilaashi · 09/01/2012 at 1:59 am

सुंदर..!!

Where thoughts are Word$ · 11/01/2012 at 1:19 am

🙂 Loved it…!! 🙂

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) · 29/01/2012 at 2:17 am

कल 30/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

sushma 'आहुति' · 30/01/2012 at 2:08 am

मेरी नाजुक हथेलियों में लकीर था वो
ना जाने कब बारिश हुई और मिट गया वो …सजीव अभिवयक्ति…..

संगीता स्वरुप ( गीत ) · 02/02/2012 at 10:34 am

खूबसूरत गज़ल

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