शब्दों के खेल में 
बातो के मेल में 
उलझते हैं दिल के सवाल कई 
 
शर्माती इठलाती हुई बातो में 
वो अनकही मुलाकातों में 
आँखों के इशारो में 
मिल जाते हैं मौसम कई 
 
छम-छम पायल की तेरी 
जुल्फों की छाव तेरी 
लबो से निकली वो बातें तेरी 
दे जाती हैं जवाब कई 
 
yaadein-memories
शाम तो रोज आती हैं 
लेकर चंदा को साथ अपने 
हवा भी चली आती हैं 
लेकर ख्याल कई 
 
जाम तो रोज रात में 
हाथ में होता हैं 
नशा चाहे हो न हो 
आईने में जब देखता हूँ 
तस्वीर अपनी  
तेरी चूडियो की खनक 
दिखाई देती हैं 
 (चिराग )
Categories: Poems

10 Comments

Babli · 24/06/2011 at 12:25 am

वाह! क्या बात है! बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार रचना लिखा है आपने ! उम्दा प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/

आशा · 24/06/2011 at 12:49 am

अच्छी रचना |किशोर वय की आदतों का अच्छा वर्णन किया है |
बधाई
आशा

डॉ॰ मोनिका शर्मा · 24/06/2011 at 10:45 am

सुंदर प्रेमपगे भाव…..

Blasphemous Aesthete · 24/06/2011 at 10:45 am

Khud ko bhool kar khud mein bhi tera aks dekhta hoon.

Bahut achhe.

Blasphemous Aesthete

Babli · 27/06/2011 at 12:59 am

मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

amrendra "amar" · 27/06/2011 at 1:16 am

bahut sunder rachna.man ko chu gaye aapke alfaj………

Ritu · 28/06/2011 at 10:34 am

bahut pyaari poem hai…

Aditya · 29/06/2011 at 5:38 am

The poet in you is a gr8 artist…

Shalini Sharma · 22/07/2011 at 9:42 am

Loved the first four lines….shabdo ke khel main, baaton ke mel main, ulajhte hain dil ke sawal kain 🙂

संजय भास्कर · 25/07/2011 at 11:43 pm

बहुत सच कहा है…बहुत सुन्दर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *